पाठ : (३८) कृदन्त (५) क्त्वा प्रत्यय ||


(एक वाक्य में प्रयुक्त दो अथवा दो से ज्यादा क्रियाओं का कर्त्ता यदि समान है, तो पूर्वकाल वाली क्रियाओं में क्त्वा प्रत्यय का प्रयोग होता है। क्त्वा प्रत्यय का अर्थ है ‘करके’। क्त्वा प्रत्ययान्त क्रियावाची शब्द अव्यय होता है।)

आत्मदर्शी दुग्धं पीत्वा क्रीडति = आत्मदर्शी दूध पीकर खेलता है।
को जानाति सुप्त्वा को जागरिष्यति = कौन जानता है सोकर कौन जगेगा ?
आर्य इष्ट्वैव भुङ्क्ते = आर्य (श्रेष्ठ व्यक्ति) यज्ञ करके ही भोजन करता है।
शिष्टो बालो पितरौ नत्वा विद्यालयं गच्छति = शिष्ट बच्चा मां-बाप को नमन करके विद्यालय को जाता  है।
व्याख्यानं श्रुत्वा प्रबुद्धः श्रोतृगणः शंकां पृच्छति = व्याख्यान सुनकर प्रबुद्ध श्रोता प्रश्न पूछता है।
सत्यस्य बोधाय विदुषः समीपं गत्वा धर्मचर्चां कुर्यात् = सत्य के बोध के लिए विद्वानों के पास जाकर धर्मचर्चा करनी चाहिए।
प्रत्यहं स्वाध्यायं कृत्वा ज्ञानं वर्धयेत् = प्रतिदिन स्वाध्याय करके ज्ञान को बढ़ाना चाहिए।
गृहस्थी प्रतिदिनं पञ्चमहायज्ञान् कृत्वैव सुखं लभते = गृहस्थी प्रतिदिन पांच महायज्ञों को करके ही सुख प्राप्त करता है।
मृत्वाऽपि यो यशःकायेन जीवति स जीवति = जीना तो उसका है जिसकी कीर्ति अमर है।
सरलं आसित्वा आसने अध्यापकः अष्टाध्यायीमध्यापयति = आसन पर सीधा बैठकर अध्यापक अष्टाध्यायी पढ़ा रहे हैं।
अद्यत्वे जनाः व्हाट्सपादिकं मुहुर्मुहुः चालयित्वा समयं व्यर्थीकुर्वन्ति = आजकल लोग व्हाट्स्एप् आदि का बार-बार प्रयोग कर समय को व्यर्थ गंवाते हैं।
पुत्री श्वशुरालयात् मातरं दूरभाषं कृत्वा श्वश्रुम् उपालभते = बेटी ससुराल से मां को फोन करके सास की शिकायत कर रही है।
पितरौ हित्वा पुत्रः पत्न्या सममन्यत्रावसत् = मां-बाप को छोड़कर बेटा पत्नी सहित अन्यत्र चला गया।
श्रवणः कष्टं सहित्वाऽपि पितरावसेवत = श्रवण ने कष्ट उठाकरके भी माता-पिता की सेवा की।
भरतः राजभवनं त्यक्त्वा कुटिरे च उषित्वाभ्रातुराज्ञाम् अपालयत् = भरत ने राजभवन को छोड़कर झोपड़ी में वास करते हुए भाई की आज्ञा का पालन किया।
चतुर्दशवर्षपर्यन्तं वनवासं श्रुत्वाऽपि रामो नाखिन्दत = चौदह वर्ष वनवास सुनकर भी राम खिन्न नहीं हुआ।
आर्ष-विद्यां पठित्वैव मनुष्याः देवाः भवन्ति = आर्ष विद्या को पढ़कर ही सामान्य मनुष्य दिव्य हो जाते हैं।
मत्वा कार्याणि करोति स एव मनुष्य उच्यते = जो विचार करके कार्यों को करता है उसको ही मनुष्य कहते हैं।
दृष्ट्वा स पादं न्यसेत् जागरूकः = जागरूक व्यक्ति को सोच-समझकर कदम उठाना चाहिए।
द्वात्रिंशद्वारं भोजनं चर्वित्वा निगरेत् = बत्तीस बार भोजन चबाकर फिर निगलना चाहिए।
दुग्धं खादित्वा रोटिकाञ्च पीत्वा भुञ्जीत = दूध को खाकर और रोटी को पीकर खाएं।
लवणं अशित्वा दुग्धं मा पिबेत् = नमकीन भोजन खाकर दूध न पीएं।
स्थित्वा कदापि जलं न पिबेत् = खड़े होकर कभी भी पानी न पीएं।
स्थित्वा अटित्वा च भोजनं पश्वाचारः = खड़े होकर घूमकर खाना पशुओं की रीति है।
ग्रीष्मर्त्तौ शिथिलानि कार्पास-वस्त्राणि धृत्वा सुखिनः स्याम = गरमी में खुले सूती वस्त्र पहनकर सुख से रहें।
पत्रं लिखित्वा समाचार-ज्ञापनं खपत्रेण लुप्तप्रायं सञ्जातम् = पत्र लिखकर हाल सुनाना ई-मेल के कारण लगभग लुप्त सा हो गया है।
माता रोटिकां वेल्लित्वा भृष्ट्वा घृतं नियोजयति = मां रोटी बेलकर, सेककर, उसपर घी लगा रही है।
पुरा भर्ज्जकः भ्राष्ट्रे चणकान् भृष्ट्वा ददाति स्म = पहले के समय में बड़भुजा भाड़ में चने भूनकर देता था।

श्रुत्वा स्पृष्ट्वा च दृष्ट्वा च भुक्त्वा घ्रात्वा च यो नरः।
न हृष्यति ग्लायति वा स विज्ञेयो जितेन्द्रियः।। = जो मनुष्य (सुखद या दुःखद) बातों को सुनकर, छूकर, सूंघकर, न तो प्रसन्न होता है न हि अप्रसन्न होता है, उसे ही जितेन्द्रिय जानना चाहिए।

कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः।
जन्मबन्धविनिर्मुक्ता पदं गच्छन्त्यनामयं।। = बुद्धि से युक्त ज्ञानी लोग कर्म से उत्पन्न होनेवाले फल (की आकांक्षा) को त्यागकर होनेवाले जन्म के बन्धन से मुक्त हुए दुःखविहीन स्थिति को प्राप्त करते हैं।

विद्यां चाऽविद्यां च यस्तद्वेदोभयं सह।
अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययामृतमश्नुते।। = जो मनुष्य विद्या (यथार्थ ज्ञान) और अविद्या (कर्म और उपासना) इन दोनों को साथ-साथ जानता है (आचरण में लाता है), वह अविद्या से मृत्यु को जीतकर विद्या से मोक्ष को प्राप्त कर लेता है।

अज्ञानप्रभवो लोभो भूतानां दृश्यते सदा।
अस्थिरत्वं च भोगानां दृष्ट्वा ज्ञात्वा निवर्त्तते।। = यह देखा जाता है कि प्राणियों में जो लोभ है वह सदा अज्ञान के कारण ही उत्पन्न होता है। सांसारिक भोगों की अस्थिरता को देखने और अच्छी प्रकार जान लेने पर लोभ की निवृत्ति हो जाती है।

पृथिवी रत्नसम्पूर्णा हिरण्यं पशवः स्त्रियः।
नाऽलमेकस्य तत्सर्वमिति मत्वा शमं व्रजेत्।। = रत्नों से भरी हुई पृथ्वी, सोना, पशु और स्त्रियां ये सभी एक मनुष्य के लिए भी पर्याप्त नहीं हैं, ऐसा विचार कर मनुष्य शान्ति को धारण करे।

गृहीत्वा दक्षिणां विप्रास्त्यजन्ति यजमानकम्।
प्राप्तविद्या गुरुं शिष्या दग्धारण्यं मृगास्तथा।। = ब्राह्मण दक्षिणा लेकर यजमान को, शिष्य विद्याप्राप्ति के बाद गुरु को और पशु जले हुए वन को त्याग देते हैं।

निर्धनं पुरुषं वेश्या प्रजा भग्नं नृपं त्यजेत्।
खगा वीतफलं वृक्षं भुक्त्वा चाऽभ्यागता गृहम्।। = वेश्या निर्धन मनुष्य को, प्रजा पराजित राजा को, पक्षी फलरहित वृक्ष को और अतिथि भोजन करके यजमान के घर को छोड़ देते हैं।

न स्वसुखे वै कुरुते प्रहर्षं चान्यस्य दुःखे भवति विषादी।
दत्त्वा न पश्चात् कुरुतेऽनुतापं स कथ्यते सत्पुरुषार्यशीलः।। = जो पुरुष अपने सुख में प्रसन्न नहीं होता, दूसरे के दुःख में दुःखी हो जाता है, और दान देकर पश्चाताप नहीं करता, वही सज्जनों में आर्यपुरुष गिना जाता है।

श्रुत्वा धर्मं विजानाति श्रुत्वा त्यजति दुर्मतिम्।
श्रुत्वा ज्ञानमवाप्नोति श्रुत्वा मोक्षमवाप्नुयात्।। = मनुष्य वेदादि शास्त्रों के श्रवण से धर्म के मर्म को जानता है, और खोटी बुद्धि को छोड़ देता है, यथार्थज्ञान को प्राप्त कर लेता है और अन्त में मोक्ष को भी पा लेता है।

द्वावम्भसी निवेष्टव्यौ गले बद्ध्वा दृढां शिलाम्।
धन्वन्तरमदातारं दरिद्रं चातपस्विनम्।। = दो मनुष्यों को गले में बड़ी भारी शिला बांधकर डुबा देना चाहिए। एक तो धनवान होकर भी दान न देनेवाले कंजूस को और दूसरे पुरुषार्थ न करनेवाले दरिद्र को।

नाऽत्यन्तं सरलैर्भाव्यं गत्वा पश्य वनस्थलीम्।
छिद्यन्ते सरलास्तत्र कुब्जास्तिष्ठन्ति पादपाः।। = मनुष्य को अत्यन्त सीधे और सरल स्वभाव का नहीं बनना चाहिए। वन में जाकर देखो, वहां सीधे वृक्ष काट डाले जाते हैं, और टेढ़े-मेढ़े वृक्ष खड़े रहते हैं अर्थात् उन्हें कोई नहीं काटता।

बहिर्भ्रमति यः कश्चित्त्यक्त्वा देहस्थमीश्वरम्।
सो गृहपायसं त्यक्त्वा भिक्षामटति दुर्मतिः।। = जो शरीर में स्थित परमेश्वर को छोड़कर बाहर भटकता फिरता है, वह उस मूर्ख के समान है, जो घर की खीर को छोड़कर भिक्षा मांगता फिरता है।

आम्रं छित्वा कुठारेण निम्बं परिचरेत्तु कः।
यश्चैनं पयसा सिञ्चेनैवास्य मधुरो भवेत्।। = कौन बुद्धिमान आम को कुल्हाडे से काटकर उसके स्थान पर नीम की सेवा करेगा ? जो आम के स्थान पर नीम को दूध से सींचता है, उसके लिए भी वह नीम मीठा फल देनेवाला नहीं हो सकता।

स्थितो मृत्युमुखे चाहं क्षणमायुर्ममास्ति नः।
इति मत्वा दानधर्मौ यथेष्टौ तु समाचरेत्।। = ‘‘मैं मौत के मुख में स्थित हूं, मेरी क्षणभर की भी आयु नहीं है’’- ऐसा समझकर मनुष्य को येथेष्ट दान और धर्म का आचरण करना चाहिए।

यस्य स्नेहो भयं तस्य स्नेहो दुःखस्य भाजनम्।
स्नेहमूलानि दुःखानि तानि त्यक्त्वा वसेत्सुखम्।। = जिसे किसी से प्रेम होता है, उसको उसी से भय भी होता है (कि बिछुड़ न जाए)। (आसक्तिमय) स्नेह दुःख का आधार है, वही ही दुःख का मूल भी है। अतः (आसक्ति बढ़ानेवाले) स्नेहबन्धनों को तोड़कर सुखपूर्वक रहना चाहिए।

यथा खात्वा खनित्रेण भूतले वारि विन्दति।
तथा गुरुगतां विद्यां शुश्रूषुरधिगच्छति।। = जैसे खोदनेवाला फावड़े आदि के द्वारा भूमि को खोदकर उसमें से जल प्राप्त कर लेता है, इसी प्रकार गुरुगत विद्या को सेवा करनेवाला विद्यार्थी ही प्राप्त कर पाता है।

एकाक्षरप्रदातारं यो गुरुं नाभिवन्दति।
श्वानयोनिशतं भुक्त्वा चाण्डालेष्वभिजायते।। = जो मनुष्य थोड़े से भी ज्ञान देनेवाले अथवा अविनाशी परमेश्वर का ज्ञान देनेवाले गुरु का मान-सम्मान नहीं करता, उसे प्रणाम नहीं करता, वह सौ बार कुत्ते का जन्म भोगकर अन्त में चाण्डाल परिवार में उत्पन्न होता है।

एकमेवाऽक्षरं यस्तु गुरुः शिष्यं प्रबोधयेत्।
पृथिव्यां नास्ति तद्द्रव्यं यद्दत्त्वा चाऽनृणी भवेत्।। = जो गुरु अपने शिष्य को थोड़ा सा भी ज्ञान देता है, अथवा अविनाशी परमेश्वर को ठीक-ठीक बोध करा देता है, पृथ्वी पर कोई ऐसा धनादि पदार्थ नहीं है जिसे गुरु को समर्पित करके शिष्य गुरु के ऋण से उर्ऋण हो सके।

यः सम्मानं सदा धत्ते भृत्यानां क्षितिपोऽधिकम्।
वित्ताभावेऽपि तं दृष्ट्वा ते त्यजन्ति न कर्हिचित्।। = जो राजा हमेशा भृत्यों का अधिक सम्मान करता है, उसका भृत्य धन के न होने पर भी अपने सम्मान का स्मरण कर उस राजा को कभी नहीं छोड़ते।

सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाऽजयौ।
ततो युद्धाय युज्यस्व नैव पापमवाप्स्यसि।। = सुख-दुःख को, लाभ और हानि को, जय और पराजय को एक समान समझकर, फिर युद्ध के लिए जुट जा, इस प्रकार युद्ध करने से तुझे पाप नहीं लगेगा।

योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जयः।
सिद्ध्यसिद्ध्योः समोभूत्वा समत्वं योग उच्यते।। = हे धनञ्जय ! योगस्थ होकर = योग में स्थिर होकर, कर्म के फल की आसक्ति को छोड़कर कर्म की सिद्धि = सफलता अथवा असिद्धि = असफलता दोनों अवस्थाओं में समता की मनोवृत्ति को धारण करके कर्म कर। कर्म की सिद्धि तथा असिद्धि दोनों ही स्थिति में मन का सम अवस्था में रहना योग कहाता है।

विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः।
रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते।। = देहधारी मनुष्य के निराहार होने पर (विषयों का भोग न करने पर/उपवास करने पर) विषय तो निवृत्त हो जाते हैं, परन्तु उन विषयों का रस (संस्कार, लालसा) बना रहता है। वह रस भी परब्रह्म का दर्शन करने पर निवृत्त हो जाता है।

भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः।
ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरं।। = भक्ति (ईश्वर-समर्पण) के द्वारा, मैं (ईश्वर) जो हूं और जैसा हूं, इस बात को जो जान लेता है, वह यथार्थ रूप में मुझे जानकर मुझ में प्रवेश पा लेता है।

यस्य नाऽहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते।
हत्वाऽपि स इमाँल्लोकान् न हन्ति न निबध्यते।। = जो अहंकार की भावना से मुक्त है, और जिसकी बुद्धि निर्लिप्त है, अर्थात् जो निःसंग है, वह इन सब लोगों को मारता हुआ भी नहीं मारता। वह कर्म करता हुआ भी कर्म के बन्धन में नहीं पड़ता।

कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेsर्जुन।
सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव सः त्याग सात्विको मतः।। = हे अर्जुन ! जो अपने नियत कर्म को अपना कर्त्तव्य समझकर करता है, अर्थात् उस कर्म के प्रति आसक्ति तथा फलाशा दोनों को छोड़कर कर्म करता है, उसका आसक्ति तथा फलाशा का त्याग सात्विक त्याग माना जाता है।

रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते।
तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते।। = जब देहधारी रजोगुण की अवस्था में मरे तब कर्मों में आसक्त लोगों में जन्म लेता है और तमोगुणी अवस्था में मरकर मूढ़ योनियों में जन्म लेता है।


संस्कृतं वद आधुनिको भव।
वेदान् पठ वैज्ञानिको भव।।
 इति
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