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यत्ननिरूपणम् ।।

आभ्यन्तरबाह्ययत्नौ
यत्नो द्विधा – आभ्यन्तरो बाह्यश्च
यत्न (प्रयत्न) दो प्रकार के होते हैं ।
१. आभ्यन्तर यत्न
२. बाह्य यत्न

वर्णो के उच्चारण में कुछ चेष्टा करनी पड़ती है‚ इसे ही यत्न कहते हैं । यह दो प्रकार का होता है‚ एक वर्णोच्चारण के पूर्व किया गया यत्न‚ दूसरा वर्णोच्चारण के समय किया गया यत्न । इनमें पहला आभ्यन्तर तथा दूसरा बाह्य यत्न कहलाता है ।

विशेष – आभ्यन्तर यत्न केवल उच्चारण करने वाला ही अनुभव कर सकता है‚ जबकि बाह्य यत्न सुनने वाला भी अनुभव कर सकता है ।

आभ्यन्तर यत्न – वर्णों के उच्चारण के ठीक पहले मुख के अन्दर किया गया यत्न आभ्यन्तर यत्न कहलाता है ।

इसके पाँच भेद हैं –
१. स्पृष्ट यत्न(स्पर्श वर्णों का)
२. ईषत्स्पृष्ट (अन्तस्थ वर्णों का)
३. ईषद्विवृत (ऊष्म वर्णों का)
४. विवृत (सभी स्वरों का)
५. संवृत (मात्र ह्रस्व अ का) ।

अवधेय – ह्रस्व अ वर्ण का उच्चारण के समय संवृत आभ्यन्तर प्रयत्न होता है किन्तु प्रयोग में अथवा लेखन आदि की दशा में ह्रस्व अ वर्ण का भी विवृत प्रयत्न ही होता है । यदि ऐसा न हो तो अकः सवर्णे दीर्घः  सूत्र ठीक से लागू नहीं हो सकेगा ।

बाह्य यत्न –
वर्णोच्चारण के स…

उच्चारणस्थानानि ।।

सवर्णसंज्ञासूत्रम् ।।

अनुनासिकसंज्ञासूत्रम् ।।

उदात्तानुदात्तस्वरितसंज्ञासूत्रम् ।।

ह्रस्वदीर्घप्लुतसंज्ञासूत्रम् ।।

४२ प्रत्याहारपरिचयः ।।