।। संस्‍कृत-प्रशिक्षणकक्ष्‍या - द्वितीय: अभ्‍यास: ।।


हिन्‍दी भाषायां पठितुम् अत्र बलाघात: करणीय:

स्‍वागतं भवतां संस्‍कृतप्रशिक्षणकक्ष्‍याया:  द्वितीयअंके

अद्यापि वयं परिचयं स्‍वीकर्तुमेव अवगच्‍छाम: ।

सर्वप्रथमं प्रार्थनां कुर्म: ।
हस्‍तौ योजयाम:।
वदाम: --

पठामि संस्‍कृतं नित्‍यं वदामि संस्‍कृतं सदा
ध्‍यायामि संस्‍कृतं सम्‍यक वन्‍दे संस्‍कृतमातरम् ।

संस्‍कृतस्‍य प्रसाराय नैजं सर्वं ददाम्‍यहम्
संस्‍कृतस्‍य सदा भक्‍तौ वन्‍दे संस्‍कृतमातरम् ।

संस्‍कृतस्‍य कृते जीवन संस्‍कृतस्‍य कृते यजन
आत्‍मानमाहुतं मन्‍ये वन्‍दे संस्‍कृतमातरम् ।

सम्‍प्रति सर्वप्रथमं पूर्वतनपाठ्यबिन्‍दूनां पुनरभ्‍यासं कुर्म: ।

सर्वेषां कृते स्‍वागतम् -
मम नाम -
भवत:/भवत्या: नाम ?
मम पितु: नाम -
भवत:/भवत्‍या: पितु: नाम ?
मम मातु: नाम -
भवत:/भवत्‍या: मातु: नाम ?
मम ----------- भ्रातर:

भवत:/भवत्‍य: कति भ्रातर: ?
मम ----------- भगिन्‍य: 

भवत:/भवत्‍य: कति भगिन्‍य:  ?
अहं ------- (व्‍यवसाय: )
भवान क:  ?
भवती का ?

उपर्युक्‍तपाठ्यबिन्‍दूनाम् अभ्‍यासं लिखित्‍वा कुर्म: ।
स्‍वमित्राणि स्‍वपरिचयं जालसंदेशमाध्‍यमेन प्रेर्षयाम: ।

अग्रे सराम: ।----------

मम ग्रामस्‍य नाम ईशपुर अस्ति - मेरे गाँव का नाम ईशपुर है ।
भवत:/भवत्‍या: ग्रामस्‍य नाम किम् - आपके गाँव का क्‍या नाम है ?

अहं फैजाबाद नगरत: अस्मि - मैं फैजाबाद शहर से हूँ ।
भवान/भवती कुत: - आप कहाँ से हैं  ?

मम प्रदेशस्‍य नाम उत्‍तरप्रदेश: - मेरे प्रदेश का नाम उत्‍तर प्रदेश है  ।
भवत:/भवत्‍या: प्रदेशस्‍य नाम किम् - आपके प्रदेश का नाम क्‍या है ?

मम देशस्‍य नाम भारतदेश: - मेरे देश का नाम भारत है ।
भवत:/भवत्‍या: देशस्‍य नाम किम् - आपके देश का क्‍या नाम है ?

अहं संस्‍कृतभारती संस्‍थायाँ कार्यं करोमि - मैं संस्‍कृतभारती संस्‍था में काम करता हूँ ।
भवान/भवती कुत्र कार्यं करोति - आप कहाँ कार्य करते हैं  ?

मम पिता वित्‍तकोषस्‍य प्रबन्‍धक: अस्ति - मेरे पिताजी बैंक मैनेजर हैं

भवत: पिता किं करोति - आपके पिता जी क्या करते हैं  ?
अथवा
भवत: पितु: व्‍यवसाय: क: - आपके पिता का व्‍यवसाय क्‍या है ?

मम माता गृहणी अस्ति - मेरी माँ गृहणी (हाउस वाइफ) हैं ।
भवत: मातु: व्‍यवसाय: क: - आपकी माँ क्‍या करती हैं ?

मम पत्र संकेत: (ईशपुर, महबूबगंज, जिल्‍ला- फैजाबाद) इति अस्ति - मेरा पता (ईशपुर, महबूबगंज, जिला- फैजाबाद) है

भवत:/भवत्‍या: पत्र संकेत: क: - आपका पता क्या है  ?

मम जालपुटसंकेत: pandey.aaanand@gmail.com अस्ति - मेरा ईमेल आईडी
pandey.aaanand@gmail.com  है 
भवत:/भवत्या: जालपुटसंकेत: क: - आपका ईमेल आईडी क्‍या है ?

मम जालपृष्‍ठसंकेत: http://sanskrit-jeevan.blogspot.com/ अस्ति मेरा वेबसाईट/ब्‍लाग आईडी http://sanskrit-jeevan.blogspot.com/ है 

भवत: जालपृष्‍ठसंकेत: क: - आपका वेबसाईट/ब्‍लाग आईडी क्‍या है ?

मम चलभाषसंख्‍या 9721519904 अस्ति - मेरा मोबाईल नम्‍बर 9721519904 है

भवत:/भवत्‍या: चलभाषसंख्‍या का - आपका मोबाईल नम्‍बर क्‍या है  ?

अद्यतनीयं अलं ।
अद्यतनं गृहकार्यं -----------
भवतां कृते मम एकं नम्रनिवेदनं अस्ति, कृपया एतेषां बिन्‍दूनां लिखित्‍वा अभ्‍यासं कुर्वन्‍तु ।

शान्तिमंत्रं वदाम:
सर्वे भवन्‍तु सुखिन: सर्वे सन्‍तु निरामय:
सर्वे भद्राणि पश्‍यन्‍तु मा कश्चित् दु:खभाग भवेत् ।।

नमो नम:
जयतु संस्‍कृतम्


भवदीय: - आनन्‍द:

टिप्पणियाँ

  1. ruchikar hai...hindi tools gayab ho gaya hai...sanskrit men likhne ka prayas karunga.

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  2. या कुंदेंदु तुषार हार धवला, या शुभ्र वस्त्रवृता.
    या वीणावर दंड मंडित करा, या श्वेतपद्मासना.
    या ब्रह्माच्युतशंकरभृतिभिर्देवै: सदा वन्दिता.
    सा मां पातु सरस्वती भगवती नि:शेष जाड्यापहा.
    (जो कुंद पुष्प,चंद्रमा और वर्फ के कंठमाळ के समान श्वेत हैं,
    जो शुभ्र वस्त्र धारण करती है
    जिनके हाथ,श्रेष्ठ वीणादंड से सुशोभित हैं,
    जो श्वेत कमल पर आसन ग्रहण करती हैं|
    ब्रह्मा,विष्णु और महेश आदिदेव,जिनकी सदैव स्तुति करते हैं|
    वह भगवती सरस्वती, मेरी सारी (मानसिक)जड़ता-मुर्खता दूर करके मेरी रक्षा करे.||

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  3. Krushna sayes:
    Treating alike-
    victory and defeat, gain and loss, pleasure and pain, get ready for the fight,then: fighting thus you will not incur sin.
    सुखदु:खे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ,
    ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि.

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  4. कर्मण्येव अधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन,
    मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते संगो अस्त्वकर्मणि.

    Your right is to work only, but never to fruit therof. Be not instrumental in making your action bear fruit, nor let your attachment be to inaction.

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  6. स्थित्प्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव ,
    स्थितधी: किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किं ?
    अर्थात:
    अर्जुन ने कृष्ण से पूछा-
    हे कृष्ण !
    What is the definition of a God realized saul-stable of mind and estaablished in samadhi (perfect tranquility of mind)?, How does the man of stable mind speak, how does he sit, how does he walk?

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  7. श्रीकृष्ण उवाच:
    प्रजहाति यदा कामान सर्वानपार्थ मनोगतान,
    आत्मन्येवात्मना तुष्ट:स्थित्धिर्मनोरुच्यते?
    श्रीकृष्ण ने कहा:
    हे अर्जुन!
    when one thoroughly dismisses all cravings of the mind, and is satisfied in the self through (the joy of) the self, then he is called stable of mind.

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  8. श्रीकृष्ण ने कहा:
    हे अर्जुन!
    दु:खेश्व्नुद्विग्नमना: सुखेषु विगतस्पृह:,
    वीतरागभयक्रोध: स्थितधीर्मुनिरुच्यते.
    The sage, whose mind remains unperturebed amid sorrows, whose thirst for pleasures has altogether disappeared, and who is free from passion, fear and anger is called stable of mind.

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  9. श्रीकृश्नोवाच:
    य: सर्वत्रानभिस्त्रेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभं
    नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता:
    Krushna says:
    He who is unattached to everything, and meeting with good and evil, neither rejoices nor recoils, his mind is stable.

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  12. शारदा जी क्षमा चाहता हूँ
    पिछले कुछ दिनों से समय नहीं दे पा रहा था ।

    साहित्‍य संगीत कला विहीन:
    साक्षात् पशु: पुच्‍छविषाणहीन:
    तृणन्‍नखादन्‍नपि जीवमान:
    तदभागधेयं परमं पशूनाम् ।।

    यह ठीक श्‍लोक है ।

    आपने जो लिखा है वो भी लगभग ठीक है, केवल अंतिम पंक्ति में त्रुटियाँ हैं ।

    उत्तर देंहटाएं
  13. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  14. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  15. sharda ji
    there is a rule of using halant
    if the last alphabet of a word is halant and just next word begins with consonant then it will be anuswar eg. आवश्‍यकं भवति (कम्-भ कं-भ) , and if there is a vowel word before halant word then it will be मkar with hal eg. आवश्‍यकम् अस्ति (कं-अस्ति कम्-अस्ति)!

    thanx

    उत्तर देंहटाएं
  16. Anand ji,
    thank you very much for explaining about the halant rule thing. But I had asked some thing about- how to put halant sign while writing in Devnagri.

    Regards.

    उत्तर देंहटाएं
  17. यदा संहरते चायं कुर्मो अन्गानीव सर्वश:,
    इन्द्रियान्णीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता. (५९).
    Krishna explains about the stable mind further:
    When like a tortoise, which draws in its limbs from all directions, he withdraws his senses from the sense-objects, his mind is (should be considered as) stable.

    उत्तर देंहटाएं
  18. विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिन:
    रसवर्जं रसोप्यस्य परं दृष्टवा निवर्तते.(59).
    Sense: (krushn says further)-objects turn away from him, who does not enjoy them with his senses; but the taste for them persists. This relilsh also disappears in the case of the man of stable mind when he sees the Supreme.

    उत्तर देंहटाएं
  19. यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चित:
    इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मन:
    O Kuntiputra Arjuna, turbulent by nature, the senses even of a wise man, who is practising self-control, forcibly carry away his mind.

    उत्तर देंहटाएं
  20. Krushna says:
    तानी सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्पर:
    वशे ही यस्येन्द्रियाणी तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता.
    Therefore, having controlled them all and collecting his mind one should sit for meditation, devoting oneself heart and soul to Me. For he, whose senses are mastered, is known to have a stable mind.

    उत्तर देंहटाएं
  21. ध्यायतो विषयां पुंस:संगस्तेषूपजायते,
    संगात्संजायते काम:कामात्क्रोधो अभिजायते. (६२).
    The man dwelling on sense-objets develops attachment for them; from attachment springs up desire, and from desire (unfulfilled) ensues anger.
    क्रोधाद्भवति सम्मोह: संमोहात्स्मृतिविभ्रम:
    स्मृति भ्रन्शातबुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति.(६३).
    From anger arises infatuation; from infatuation confusion of memory; from confusion of memory, loss of reason; and from loss of reason one goes to complete ruin.

    उत्तर देंहटाएं
  22. रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन,
    अत्मवशयै:विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति.
    The self-controlled practicant; while enjoying the various sense-objects through hs sense, which are disciplined and free from likes and dislikes, attains placidity of mind.

    उत्तर देंहटाएं
  23. प्रसादे सर्व दु:खानां हानिरस्योपजायते
    प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धि: पर्यवतिष्ठते-६५
    With the attainment of such placidity of mind, all his sorrows come to an end; and the intellect of such a person of tranquil mind, soon withdrawing itself from all sides, becomes firmly established in God.

    उत्तर देंहटाएं
  24. नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना,
    न चाभावयत:शान्तिरशान्तस्य कुत:सुखम.-६६
    He who has not controlled his mind and senses can have no reason; nor can such undisciplined man think of God. The unthinking man can have no peace; and how can there be hapiness for one lacking peace of mind?

    उत्तर देंहटाएं
  25. नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना,
    न चाभावयत:शान्तिरशान्तस्य कुत:सुखम.-६६
    He who has not controlled his mind and senses can have no reason; nor can such undisciplined man think of God. The unthinking man can have no peace; and how can there be hapiness for one lacking peace of mind?

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