पाठ (4) द्वितीया विभक्तिः




कर्त्तृवाच्य (एक्टिव वॉइस) में कर्म (=क्रिया की निष्पत्ति में कर्त्ता को अत्यन्त अभीष्ट वस्तु) कारक में द्वितीया विभक्ति होती है यथा-

इन्द्रः राज्यम् इन्दति = राजा राज्य पर शासन करता है।
वस्त्रसेवकः वस्त्रं सीव्यति = दर्जी कपड़े सिल रहा है।
पितृव्या कन्थां कन्थति = चाची गुदड़ी सिल रही है।
माता दधि मथ्नाति = मां दही मथ्ज्ञ रही है।
चिन्तकः चित्तं मथ्नाति / मन्थति = विचारक खूब विचार-विमर्श (मन्थन) कर रहा है।
मथनी दधि मथ्नाति = मथनी दही बिलो रही है।
पिता मृतपुत्रं शोचति / शोकति = पिता मृतपुत्र का शोक करता है।
सेविका तण्डुलान् शोधति = सेविका चावल साफ कर रही है।
शोधकः त्रुटीः संशोधयति = शोधक (प्रुफ रीडर) गलतियां छांट रहा है।
ईश्वरः अस्मान् शुन्धति = ईश्वर हमें पवित्र कर रहा है।
ज्ञानं मनः शुच्यति / शुच्यते = ज्ञान मन को शुद्ध करता है।
स्वसा भाण्डानि मार्जयति = बहन पात्रों को मांज रही है।
वसुधा वस्त्राणि प्रक्षालयति = वसुधा कपड़े धो रही है।
पितृस्वसा प्राङ्गणं सम्मार्जयति = बुआ आंगन बुहार रही है।
मातृष्वसा गृहं / गेहं सम्मार्ष्टि = मौसी घर बुहार रही है
पविता बुद्धिं पुनाति = पवित्र ईश्वर बुद्धि को निर्मल करता है।
पवनः वातावरणं पवते = वायु वातावरण को शुद्ध करती है।
अग्निहोत्रं गृहं पवित्रयति = हवन घर को पवित्र करता है।
सत्यं चित्तं पवित्रीकरोति = सत्य चित्त को पवित्र करता है।

भोजभूरित्वम् (भोज सम्बन्धित विविध क्रियाएं)

भवति किं चर्वति = आप क्या चबा रही है ?
अहं भूचणकान् चबामि = मैं मूंगफली चबा रही / रहा हूं।
इयं बालिका जंबीररसं पिबति = यह बच्ची नींबूपानी पी रही है।
ज्वरितः गुलिकां निगलति = रुग्ण गोली खा रहा है।
सा बाला आम्रं चूषति = वह लड़की आम चूसती है।
इमे किशोर्याै शष्कुलीः खादतः = ये दोनों किशोरियां पूड़िया खा रही हैं।
इमाः कन्या अवलेहम् अवलिहन्ति = ये कन्याएं चटनी चाट रही हैं।
इमौ किशोरौ शाल्यपूपान् अत्तः = ये दोनों किशोर डोसे खा रहे हैं।
इमे कुमाराः वाष्पापूपान् अश्नन्ति = ये सब कुमार इड़ली खा रहे हैं।
पितामहः कृसरां / कृशरां भुङ्क्ते = दादाजी खिचड़ी खा रहे हैं।
पितामही गुलाबजामुनानि जमति = दादी गुलाबजामुन खा रही है।
मातामहः चायं आचमनति = नाना चाय की चुस्कियां ले रहे हैं।
मातामही रोटिकां ग्रसति = नानी एकेक ग्रास रोटी खा रही है।
महिषी घासं घसति = भैंस घास खा रही है।
बलिवर्दः घासं चरति = बैल घास चर रहा है।
वत्सा तृणानि तृणति = बछड़ी तिनके खा रही है।
गौः चवितं रोमन्थायते = गाय खाए हुए की जुगाली कर ही है।
चटका अन्नकणान् उञ्छति = चिड़िया दाने (अन्नकण) चुग रही है।
माता तण्डुलान् उञ्छति = मां चावल बीन रही है।
भक्षकः भक्ष्यं भक्षति = भोजनभट्ट भोजन चट कर रहा है।
जठरः भुक्तं जठति = उदर खाए-पीए अन्नादि को धारण करता / रखता है।
शुण्ठिः श्लेष्म शुण्ठति = सौंठ कफ को सुखाती है।
उद्दण्डः चाकखण्डं खण्डति = शरारती बालक चॉक (श्यामफलक की चूने से बनी लेखनी) के टुकड़े कर रहा है।
काष्ठाहरः काष्ठानि आहरति खण्डति च = लकड़हारा लकड़ियां लाता है और उसे फाड़ता है।
चण्डी प्रतिवेशिनं चण्डति = गुस्सैल महिला पड़ोसी वपर क्रोध कर रही है।
मुण्डकः मुण्डं मुण्डति = नाई सिर मूंड रहा है।
भवान् किं ढुंढति ? = आप क्या ढूंढ रहे है ?
अहं संस्कृत-शब्दान् अन्वेषयामि = मैं संस्कृत भाषा के शब्दों को खोज रहा हूं।
वैज्ञानिकः किं आविष्करोति ? = वैज्ञानिक क्या आविष्कार कर रहा है ?
वैज्ञानिकः नवं विज्ञानं विवृणुते = वैज्ञानिक नई खोज को प्रस्तुत (उद्घाटित) कर रहा है।
गुप्तचरः रहस्यं उद्घाटयति = जासूस रहस्य खोल रहा है।


अनुवादिका: आचार्या शीतल (प्रधानाचार्या, आर्यवन आर्ष कन्या गुरुकुल, आर्यवन, रोजड़, गुजरात)
भूतपूर्व - आचार्या, आर्ष शोध संस्थान, कन्या गुरुकुल अलियाबाद, आन्ध्रप्रदेश, आर्यावर्त्त)
टंकन प्रस्तुति: ब्रह्मचारी अरुणकुमार "आर्यवीर" (आर्यवीर प्रकाशन, मुम्बई, महाराष्ट्र, आर्यावर्त्त)


इति

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