पाठ (5)द्वितीया विभक्तिः




कर्त्तृवाच्य (एक्टिव वॉइस) में कर्म (=क्रिया की निष्पत्ति में कर्त्ता को अत्यन्त अभीष्ट वस्तु) कारक में द्वितीया विभक्ति होती है यथा-

तक्षकः काष्ठं तक्षति = बढ़ई लकड़ी छील रहा है।
पक्त्री अलाबूं त्वचयति = पाचिका लौकी छील रही है।
वानरः कदलीफलं त्वचयति = बन्दर केले का छिलका उतार रहा है।
पक्ता वृन्ताकं कृन्तति = रसोइया बैंगन काट रहा है।
मूषकः कर्गलानि कृन्तति = चूहा कागज काट रहा है।
पचः शाकं कर्त्तयति = पाचक सब्जी काट रहा है।
पचा वटकान् तलति = पाचिका वड़े तल रही है।
पक् रोटिकां वेल्लति = पाचक / पाचिका रोटी बेल रही है।
भगिनी चूर्णं गुम्फति = बहन आटा गूंथ रही है।
पेष्टा गोधूमान् पिंशति = पीसनेवाला गेहूं पीस रहा है।
पेषणी कटिजान् पिनष्टि = चक्की मक्का पीस रही है।
क्षोत्ता माषान् क्षुणत्ति = कूटनेवाला उड़द कूट रहा है।
शिल्पी कुट्टिमं कुट्टयति = मिस्त्री फर्श को कूट रहा है।
कान्दविकः क्वथितालून् मृद्नाति = हलवाई उबले हुए आलुओं को मसल रहा है।
दुग्धविक्रेता दुग्धे जलं मेलयति = दूध बेचनेवाला दूध में पानी मिला रहा है।
घर्षकः गृञ्जनानि घर्षति = घिसनेवाला गाजर घिस रहा है।
दुःखदः दुःखं ददाति = दुःखदाता दुःख देता है।
कथाकारः कथां करोति = कथाकार कथा करता है।
श्लोककारः श्लोकं करोति = श्लोककार श्लोक बनाता है।
चाटुकारः चाटु करोति = चापलूस चापलूसी करता है।
सूत्रकारः सूत्रं करोति = सूत्रकार सूत्र बनाता है।
कलहकारः कलहं करोति = झगड़ालू झगड़ा करता है।
वैरकारः वैरं करोति = वैरी वैर करता है।
शकृत्करः शकृत् करोति = बछड़ा शौच करता है।
आत्मम्भरिः आत्मानं बिभर्त्ति = स्वार्थी अपना भरण-पोषण करता है।
धर्मधरः धर्मं धरति = धार्मिक धर्म को धारण करता है।
सत्यपालः सत्यं पालयति = सत्यपाल सत्य का पालन करता है।
गोपालः गां पालयति = गोपाल गाय / पृथ्वी / वाणी की रक्षा करता है।
गोपः गां पाति = गोपाल गाय / पृथ्वी / वाणी की रक्षा करता है।
गोरक्षः / गोरक्षकः गां रक्षति = गोपाल गाय / पृथ्वी / वाणी की रक्षा करता है।
धरणीधरः धरणीं धरति = पहाड़ / राजा पृथ्वी को धारण करता है।
अङ्गमेजयः अङ्गानि एजयति = कम्पवा अंगों को हिलाता है।
जनमेजयः जनान् एजयति = जनमेजय लोगों को हिलाता है।
मृत्युञ्जजयः मृत्युं जयति = मृत्युंजय मृत्यु को जीतता है।
शत्रुञ्जयः शत्रून् जयति = शत्रुंजय शत्रु को जीतता है।
सञ्जयः सर्वं सञ्जयति = संजय सभी को अच्छी प्रकार जीतता है।
नासिकन्धमः नासिकां धमति = खर्राटे भरनेवाला खर्राटे (नीन्द) भर रहा है।
मुष्टिन्धयः मुष्टिं धयति = मुट्ठी पीनेवाला / चूसनेवाला बच्चा मूट्ठी चूस रहा है।
अङ्गुष्ठन्धयः अङ्गुष्ठं धयति = अंगूठा चूसनेवाला अंगूठा चूसता है।
 
अनुवादिका: आचार्या शीतल (प्रधानाचार्या, आर्यवन आर्ष कन्या गुरुकुल, आर्यवन, रोजड़, गुजरात)

भूतपूर्व - आचार्या, आर्ष शोध संस्थान, कन्या गुरुकुल अलियाबाद, आन्ध्रप्रदेश, आर्यावर्त्त)

टंकन प्रस्तुति: ब्रह्मचारी अरुणकुमार "आर्यवीर" (आर्यवीर प्रकाशन, मुम्बई, महाराष्ट्र, आर्यावर्त्त)
इति

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