पाठ (7)द्वितीया विभक्तिः ||


(अधि + शीङ्, अधि + स्था, अधि + आस्, अधि + वस्, आङ् + वस्, अनु + वस्, उप + वस्, अभि+नि+विश् इन धातुओं के आधार की कर्म संज्ञा होती है और कर्म संज्ञा होने से द्वितीया विभक्ति होती है।)
खट्वाम् अधिशेते = खाट पर सोता है।
शिशुः दोलाम् अध्यशयिष्ट = शिशु पालने में सो गया।
हिंदोलां शयिष्यते माणवः = बच्चा झूले में सोएगा।
हिंदोलां शयीत = झूले में सोवे।
अहं ग्रामं अधितिष्ठामि = मैं गांव में रहती / रहता हूं।
भवान् ह्यः कुत्र अध्यस्थात् = कल आप कहां ठहरे थे..?
श्वः आवां धर्मशालाम् अधिस्थास्यावः = कल हम दोनों धर्मशाला में रहेंगे।
त्वं पान्थशालाम् अधितिष्ठेः = तुम्हें होटल में ठहरना चाहिए।
वृद्धा मृदुपर्यङ्कं अध्यास्ते = बुढिया सोफे पर बैठी है।
ज्येष्ठतातः आसन्दिकाम् अध्यासिष्यते = ताऊजी कुर्सी पर बैठेंगे।
ज्येष्ठाम्बा चतुष्पादिकाम् अध्यासिष्ट = ताई चौकी पर बैठी थी।
अनुजः त्रिपादिकाम् अध्यास्ताम् = छोटा भाई तिपाई पर बैठे।
अनुजा संवेशम् अध्यासीत् = छोटी बहन स्टूल पर बैठे।
अग्रजः फलकम् अध्यास्त = बड़े भैया मेज पर बैठे।
प्रधानमन्त्री दिल्लीम् अधिवसति = प्रधानमन्त्री दिल्ली में रहते हैं।
ब्रह्मचारिण्यः गुरुकुलम् अध्यवात्सीत् = ब्रह्मचारिणियां गुरुकुल में रहीं।
दम्पति भाटकगृहं अधिवत्स्यति = पति-पत्नी किराए के घर में रहेंगे।
महिष्यः अन्तःपुरम् आवसति = रानियां रनिवास में रहती हैं।
महिष्यः प्राङ्गणं आवसन् = भैंस आंगन में रहती थी।
तापसः पर्णशालाम् आवसेत् = तपस्वी झोपड़ी में रहे / रहना चाहिए।
वानप्रस्थिनी कुटीम् आवसतु = वानप्रस्थ-दीक्षिता-महिला कुटिया में रहे।
ग्रामीणाः ग्रामम् अनुवसन्ति = ग्रामीण गांव में रहते हैं।
नागराः नगरं उपवसन्ति = नागरिक नगर में रहते हैं।
नागरकाः नगरम् एव उपवसन्ति = नगर में रहनवाले दुष्ट / प्रवीण लोग भी नगर ही में रहते हैं।
मृगाः वनमेव अनुवसेयुः = जंगली पशु जंगल में ही रहने चाहिएं।
आरण्याः अरण्यम् उपवसन्तु = जंगली पशु अरण्य में रहें।
सिंहः गुहाम् अभिनिविशते = शेर गुफा में प्रवेश कर रहा है।
व्यालः बिलम् अभिन्यविशत = सांप बिल में घुस गया।
काकः कुलायम् अभिनिवेक्ष्यते = कौआ घोसले में प्रवेश करेगा।
वायसः नीडम् अभिन्यविष्ट = कौआ घोसले में घुस गया।

(क्रुध् व द्रुह् अर्थवाली सोपसर्ग धातुओं के प्रयोग में जिस पर क्रोध व द्रोह किया जाता है उसकी कर्म संज्ञा होती है और उससे द्वितीया विभक्ति होती है।)
जाल्मोऽयं पितरौ अभिक्रुध्यति = जालीम यह मां-बाप पर गुस्सा करता है।
स्नुषा श्वश्रुम् अभिक्रुध्यत् = बहु ने सास पर गुस्सा किया।
चण्डा भर्त्तारम् अभिचण्डेत् = क्रोधी महिला अपने पति पर गुस्सा कर सकती है।
कान्ता कान्तं प्रतिकोपिष्यति = पत्नी पति पर गुस्सा करेगी।
भामिनी पतिम् अभ्यभामिष्ट = गुस्सैल पत्नी ने अपने पति पर गुस्सा किया।
दुष्टः भ्रातरम् अभिद्रुह्यति = दुष्ट व्यक्ति भाई से द्रोह करता है।
राष्ट्रद्रोहिणः राष्ट्रम् अभिद्रोहिष्यन्ति = राष्ट्रद्रोही लोग राष्ट्र के प्रति द्रोह करेंगे।
विधर्मी धर्मम् अभ्यद्रुहत् = विधर्मी (अधार्मिक) ने धर्म से द्रोह किया।
कौरवाः पाण्डवान् अभिदुद्रुहुः = कौरवों ने पाण्डवों से द्रोह किया।
ननान्दा भ्रातृजायाम् अभिदु्रह्येत् = ननन्द भाभी से द्रोह कर सकती है।

(गत्यर्थक, ज्ञानार्थक, भक्षणार्थक, शब्दकर्मार्थक एवं अकर्मक धातुओं के अण्यन्तावस्था में जो कर्त्ता है, वह धातुओं की ण्यन्तावस्था में कर्मसंज्ञक होता है, अतः उससे द्वितीया विभक्ति होती है।)
गत्यर्थक
पुत्रः पाठशालां गच्छति = पुत्र पाठशाला जाता है।
पिता पुत्रं पाठशालां गमयति = बाप बेटे को पाठशाला भेज रहा है।

दुहिता विश्वविद्यालयं गमिष्यति = पुत्री कॉलेज जाएगी।
माता दुहितरं विश्वविद्यालयं गमयिष्यति = मां बेटी को कॉलेज भेजेगी।

औरसः पुत्रः विदेशम् अगमत् = सगा बेटा विदेश गया।
जननी औरसं पुत्रं विदेशम् अजीगमत् = माता ने सगे बेटे को विदेश भेजा।

पौत्री महाविद्यालयं गच्छेत् = पोती को उच्च विद्यालय में जाना चाहिए।
पितामहः पौत्रीं महाविद्यालयं गमयेत् = दादा को पोती महाविद्यालय में भेजनी चाहिए।

सेवकः आपणं प्रेष्यति = सेवक दुकान पर जाता है।
स्वामी सेवकं आपणं प्रेषयति = स्वामी सेवक को दुकान पर भेजता है।

वत्सा व्रजं व्रजति = बछड़ी गोशाला में जा रही है।
वत्सां व्रजं व्राजयति = बछड़ी को गोशाला में भेज रहा है।

अजा अजिरम् अजति = बकरी बाड़े में जा रही है।
अजां अजिरम् आजयति = बकरी को बाड़े में भेज रहा है।

जामाता प्रकोष्ठं प्रविशति = दामाद कमरे में प्रवेश करता है।
जामातरं प्रकोष्ठं प्रवेशयति = दामाद को कमरे में प्रवेश करवाता है।

यतिः मठं याति = यति मठ में जा रहा है।
यतिं मठं यापयन्ति = यति को मठ की ओर भेज रहे हैं।

वानप्रस्थी वनम् आगच्छति = वानप्रस्थी वन में आ रहा है।
वानप्रस्थिनं वनम् आगमयति = वानप्रस्थी को वन में भेज रहा है।

ज्ञानार्थक
समित्पाणिः शिष्यः शास्त्राणि जानाति = समर्पित शिष्य शास्त्रों को जानता है।
समित्पाणिं शिष्यं शास्त्राणि ज्ञापयति = समर्पित शिष्य को शास्त्र जना रहा है।

छात्रः धर्म बुध्यते = छात्र धर्म को जानता है।
छात्रवत्सलः गुरुः छात्रं धर्म बोधयति = छात्रवत्सल गुरु छात्र को धर्म का बोध कराता है।

छात्रा सदाचारं वेत्ति = छात्रा सदाचार को जानती है।
छात्रप्रिया आचार्या छात्रां सदाचारं वेदयति = छात्रप्रिया आचार्या छात्राओं को सदाचार का बोध करवा रही है।

प्राकृतः जनः न्यायं बोधति = आम इन्सान उचित व्यवहार को जानता है।
बुधः प्राकृतं जनं न्यायं बोधयति = विद्वान् आम इन्सान को उचित व्यवहार का बोध कराता है।

श्रोता व्याख्यानम् अवगच्छति = श्रोता व्याख्यान को समझ रहा है।
वक्ता श्रोतारं व्याख्यानम् अवगमयति = वक्ता श्रोता को व्याख्यान समझा रहा है।

दयानन्दः व्याकरणम् अज्ञासीत् = दयानन्द जी ने व्याकरण को जाना (समझा)।
विरजान्दः दयानन्दं व्याकरणम् अजिज्ञपत् = विरजानन्द जी ने दयानन्द जी कोे व्याकरण समझाया।

छात्राः आर्षग्रन्थान् ज्ञास्यन्ति = छात्राएं ऋषिकृत ग्रन्थों को जानेंगी।
आचार्या छात्राः आर्षग्रन्थान् ज्ञापयिष्यति = आचार्या छात्राओं को आर्षग्रन्थों को जनाएंगी।

सर्वे दर्शनानि जानीयुः = सभी को दर्शनविद्या जाननी चाहिए।
विद्वांसः सर्वान् दर्शनानि ज्ञापयेयुः = विद्वान् लोग सभी को दर्शनशास्त्र जनाएं।

आचार्या शीतल जी आर्ष गुरुकुल अलियाबाद
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इति

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