पाठ: (9)तृतीया विभक्ति (1) + यण सन्धिः ।।


{ करण कारक (क्रिया सम्पन्न करने का साधन) में तृतीया विभक्ति होती है ।}

मथन्या मथ्नाति दधि माता = मां मथनी से दही बिलो रही है।
पर्पेण पर्पति पर्पिकः = पंगू (बैसाखीवाला) बैसाखी से चलता है।
वणिक् तुलया धान्यं माति = बनिया तराजू से धान तोल रहा है।
लेखिका लेखन्या लेखं लिखति = लेखिका लेखनी से लेख लिखती है।
सूक्ष्मशरीरेण आत्मा अतति = सूक्ष्म शरीर से आत्मा सतत गति (एक से दूसरे शरीर में) करता है।
पक्षेण पक्षिणः डयन्ते = पंख से पक्षी उड़ते हैं।
हस्तेन हस्ती भारं वहति = सूंड से हाथी भार ढोता है।
मनस्वी मनसा मनुते = मनस्वी मन से मनन करता है।
मनीषी मनीषया मनः ईषते = मनीषी बुद्धि से मन को जानता है।
पण्डितः पण्ड्या पण्डितत्वं प्राप्नोति = पण्डित बुद्धि (=पण्डा) से विद्वत्ता (=पण्डितत्व) को प्राप्त करता है।
बुद्धः बुद्ध्या बोध्यम् अवबुध्यते = ज्ञानी (=बुद्धः) बुद्धि से जाननेयाग्य पदार्थों को जानता है।
वेत्ता विद्यया विश्वं वेत्ति = विद्वान् विद्या से सब कुछ जानता है।
स्मर्त्ता स्मृत्या भूतकालं स्मरति = याद करनेवाला स्मृति से भूतकाल को याद करता है।
ज्ञानी ज्ञानेन ईश्वरमपि जानाति = ज्ञानी ज्ञान से ईश्वर को भी जान लेता है।
भर्त्ता भृत्त्या भृत्यं भरति = पालक (=भर्त्ता) वेतन (=भृत्तिः) से सेवक (=भृत्य) का भरण-पोषण करता है।
यात्री यानेन यात्रास्थलं याति = यात्री वाहन से यात्रास्थल को जाता है।
दाता दानेन दरिद्रं उपकरोति = दाता दान से दरिद्र का उपकार करता है।
ध्याता ध्यानेन धर्त्तारं ध्यायति = ध्यान करनेवाला (=ध्याता) ध्यान के द्वारा धारण करनेवाले ईश्वर (=धर्त्ता) का चिन्तन करता है।
द्रष्टा दर्शनेन दृश्यं पश्यति = ज्ञानी (=द्रष्टा) दर्शनशास्त्र के द्वारा संसार (=दृश्यम्) को देखता है।
चित् चित्तेन चलाचलं जगत् चेतयति = चेतन आत्मा चित्त से चल-अचल जगत् को जानता है।
आनन्दः आनन्देन अस्मान् आनन्दयति = आनन्दस्वरूप ईश्वर हमें आनन्द देकर आनन्दित करता है।
अद्भिः गात्राणि शुद्ध्यन्ति = पानी से शरीरावयव साफ होते हैं।
मनः सत्येन शुद्ध्यति = मन सत्य से पवित्र होता है।
विद्यातपोभ्यां भूतात्मा शुद्ध्यति = विद्या और तप से जीवात्मा शुद्ध होता है।
क्षान्त्या शुद्ध्यन्ति विद्वांसः = विद्वान् क्षमा से शुद्ध होते हैं।
दानेन अकार्यकारिणः शुद्ध्यन्ति = दान के द्वारा पापी शुद्ध होते हैं।
प्रच्छन्नपापाः जप्येन शुद्ध्यन्ति = गुप्त रूप (=मानसिकरूप) से पाप करनेवाले जप से शुद्ध होते हैं।
तपसा वेदवित्तमाः शुद्ध्यन्ति = तप से उत्तम विद्वान् (=वेदवित्) शुद्ध होते हैं।
उच्छिष्टं पात्रं मृत्तोयैः शुद्ध्यति = जूठा बरतन मिट्टी व पानी से साफ होता है।
धातवः अग्निना शुद्ध्यन्ति = धातुएं अग्नि से शुद्ध होती है।
प्राणायामैः दहेत् दोषान् = प्राणायाम से दोषों को भस्म कर देवें।
प्राणायामेन क्षीयते प्रकाशावरणम् = प्राणायाम से अज्ञान (=प्रकाश का आवरण) नष्ट होता है।
योगाङ्गानुष्ठानेन ज्ञानदीप्तिर्भवति = योग के अंगों के अनुष्ठान से ज्ञान बढ़ता है।
मनःप्रग्रहेण आत्मानं संयच्छेत् = मन रूपी लगाम से आत्मा को नियन्त्रित करे।
समर्थाः अपि स्वकर्मभिः वध्यमानाः दृश्यन्ते = समर्थ लोग भी अपने बुरे कर्मों के कारण नष्ट हुए दिखाई देते हैं।
पुण्येन पुण्यलोकं जयति = पुण्य कर्मों से (व्यक्ति) स्वर्ग (=पुण्यलोक) को जीतता है (प्राप्त करता है)।
पापेन पापलोकं गच्छति = पाप कर्मों से नरक को प्राप्त करता है।
गन्धेन गावः पश्यन्ति = गाएं गन्ध से देखती हैं।
वेदैः पश्यन्ति ब्रह्मणाः = ब्रह्मण वेदों से देखते हैं।
चारैः पश्यन्ति राजानः = राजा लोग गुप्तचरों से देखते हैं।
चक्षुर्भ्यामितरे जनाः पश्यन्ति = आंखों से अन्य / सामान्य (=इतर) लोग देखते हैं।
आत्मना आत्मानम् अन्विच्छेत् = अपने आप से अपने आप को जाने।
विद्यया विन्दते वसु = विद्या से धन प्राप्त होता है।
अविद्यया मृत्युं तरति = अविद्या (अपरा विद्या) से मृत्यु (शारीरिक कष्ट, बाधा, विपदाएं) से तर जाता है।
विद्यया अमृतम् अश्नुते = विद्या (परा विद्या) से अमृत (मोक्ष सुख) को प्राप्त कर लेता है।
न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्यः = मानव को धन से कभी तृप्त नहीं किया जा सकता।
क्षमया किं न साध्यते ? = क्षमा से क्या प्राप्त नहीं होता ?
वाचा वदामि मधुमत् = वाणी से मैं मीठा बोलूं।
स्वेन क्रतुना संवदेत = (व्यक्ति) अपने कर्म से बोले।
क्रतुना ब्रवीतु = कर्म (आचरण) से बोलो।
विमानेन दिवं विगाहते = विमान से आकाश में घूम रहा है।
यत्नेन सिद्धîन्ति कामाः = पुरुषार्थ से कामनाएं पूर्ण होती हैं।
धर्मेण एधते नित्यम् = धर्म से (व्यक्ति) नित्य ही वृद्धि को प्राप्त होता है।
हविषा हूताशनो वर्धते = हवी से अग्नि बढ़ती है।
पुरुषार्थेन कार्याणि सिद्ध्यन्ति, न मनोरथैः = मेहनत से कार्यों की सिद्धि होती है न कि ख्याली पुलाव पकाने से।
सप्तभिः अश्वैः सविता संचरति सदा = सूर्य सदा सात घोड़ों से चलता है।
धनलोलुपः जलेन दुग्धं वर्धयति = धन का लोभी पानी से दूध बढ़ा रहा है।
अन्नेन भूतानि जीवन्ति = अन्न से प्राणी जीते हैं।
प्राणैः प्राणिनः प्राणन्ति = प्राणों से प्राणी जीते हैं।
भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम = हम कानों से कल्याणकारी बातें सुनें।
भद्रं पश्येम अक्षभिः = आंखों से हम भला देखें।
माम् अद्य मेधया मेधाविनं कुरु = मुझे आज ही मेधा बुद्धि से मेधावी करो।
अस्मान् प्रजया, पशुभिः, ब्रह्मवर्चसेन, अन्नाद्येन समेधय = हमें प्रजा से, पशु (धन-सम्पत्ति) से, ब्रह्मतेज से, अन्न (भोग्य पदार्थों) से तथा अद्य (भोग सामर्थ्य) से अच्छी तरह बढ़ा।
आयुः यज्ञेन कल्पन्ताम् = आयु को यज्ञ से सम्पादित करो।
दीपेन दीपं दीप्येत् = दीपक से दीपक जलाना चाहिए।

यण् सन्धिः

इको यण् अचि। इक् = इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ऋृ, लृ, के बाद अच् = अ आ... आदि स्वर हो तो इ एवं ई को य्, उ एवं ऊ को व्, ऋ तथा ऋृ को र् तथा लृ को ल् हो जाता है।

इ / ई + अच् (इ, ई को छोड़ कर) = इ / ई को य्
उ / ऊ + अच् (उ, ऊ को छोड़ कर) = उ / ऊ को व्
ऋ / ऋृ + अच् (ऋ, ऋृ को छोड़ कर) = ऋ / ऋृ को र
लृ + अच् = लृ को ल्

दधि + अशान = दध्यशान।
तिष्ठतु दध्यशान त्वं शाकेन = दही रहने दे, तू शाक से खा ले।

दधि + ओदनम् = दध्योदनम्।
दध्योदनं रुच्या खादति बालः = बालक दही-चावल रुची से खाता है।

अभि + आवहति = अभ्यावहति।
अभ्यावहति कल्याणं विविधं वाक् सुभाषिता = सुभाषित वाणी विविध प्रकार के कल्याण / सुखों को प्राप्त कराती है।

हि + एव = ह्येव।
आत्मा ह्येवात्मनो बन्धुः = आत्मा का भाई आत्मा खुद ही है।

नदी + अस्मान् = नद्यस्मान्।
नद्यस्मान् जलेन तृप्यति = नदी हमको जल से तृप्त करती है।

इति + उवाच = इत्युवाच।
वनं गमिष्यामि इत्युवाच रामः प्रहसन् = राम ने हंसते हुए वन में जाऊंगा ऐसा कहा।

अन्तेवासिनी + ऋग्वेदम् = अन्तेवासिन्यृग्वेदम्।
अन्तेवासिन्यृग्वेदं रटति = छात्रा ऋग्वेद रट रही है।

अन्तेषु + अपि = अन्तेष्वपि।
अन्तेष्वपि जातो वृत्तेन विशेष्यते = निम्नकुल में उत्पन्न होने पर भी आचरण से विशेष हो जाता है।

कटु + अपि = कट्वपि।
कट्वपि भेषजं गदहारी = कड़वी होने पर भी दवाई रोग दूर करनेवाली होती है।

स्वादु + औषधम् = स्वाद्वौषधम्।
कदाचित् स्वाद्वौषधमपि गदहारी भवति = कभी कभी मीठी दवाई भी रोगों को दूर करनेवाली होती है।

पातु एतम् + पात्वेतम्।
पात्वेतम् आत्मानं दुर्गुणैः = इस आत्मा की दुर्गुणों से रक्षा करो।

साधु + आलेखयति = साध्वालेखयति।
चित्रकथः रामं साध्वालेखयति = उत्तम कथाकार राम का अच्छा चित्रण करता है।

भर्त्तृ + एकमना = भर्त्रेकमना।
भर्त्रेकमना भार्या भवेत् = पति के समान मन वाली पत्नी होनी चाहिए।

पितृ + अर्थम् = पित्रर्थम्।
पित्रर्थं पुत्रः पिष्टान्नं पैषयत् = पिता के लिए पुत्र ने पंजीरी भेजी।

लृ + इति = लिति।
वत्स ! लित्यालेखयत्वत्र = बेटे ! ‘लृ’ ऐसा यहां लिखो।

आचार्या शीतल जी आर्ष गुरुकुल अलियाबाद
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इति

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