संदेश

August, 2016 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

पाठ : (३९) कृदन्त (६) ल्यप् प्रत्यय ||

चित्र
(सोपसर्ग = उपसर्ग सहित धातु हो तो क्त्वा प्रत्यय के स्थान पर ल्यप् प्रत्यय का प्रयोग होता है। ल्यप् प्रत्ययान्त क्रिया शब्द भी अव्यय होता है, अतः इसके विभिन्न विभक्तियों में रूप नहीं चलते।)

छात्राः गुरुकुले प्रातरुत्थाय ईश्वरं ध्यायन्ति = छात्राएं गुरुकुल में सुबह उठकर ईश्वर का ध्यान करती हैं।
पुरा पितामही कूपात् जलमानीय स्नाति स्म = पहले दादीमां कुंए से पानी लाकर स्नान करती थीं।
धनयन्त्रात् रुप्यकाणि निसार्य आपणं गता = एटीएम से पैसे निकालकर दुकान पर गई।
सम्भूय सर्वे बालाः क्रीडन्ति = मिलकर के सभी बच्चे खेल रहे हैं।
चटका धान्यकणान् चञ्च्वा आदाय चाटकैरं भोजयति = चिड़िया चोंच से दाने लाकर बच्चे को खिला रही है।
पथिभ्रष्टो हिरणः ग्रामस्य प्राकारं प्रकूर्द्य वनं प्राविशत् = मार्ग भटका हुआ हिरण गांव की चारदिवारी कूदकर वनमें चला गया।
पक्षिणः प्रातः वृक्षात् उड्डीय अस्तं पुनरागच्छन्ति = पक्षी पेड़ पर से सुबह उड़कर शाम को फिर लौट आ जाते हैं।
गुणिनोऽविगणय्य स्वकष्टान् उपकुर्वन्ति = सज्जन अपने कष्टों की परवाह किए बिना उपकार में लगे रहते हैं।
गोभक्तः विक्रीय महिषीं गामक्रैषीत् = गोभक्त ने भैंस बेचक…

पाठ : (३८) कृदन्त (५) क्त्वा प्रत्यय ||

चित्र
(एक वाक्य में प्रयुक्त दो अथवा दो से ज्यादा क्रियाओं का कर्त्ता यदि समान है, तो पूर्वकाल वाली क्रियाओं में क्त्वा प्रत्यय का प्रयोग होता है। क्त्वा प्रत्यय का अर्थ है ‘करके’। क्त्वा प्रत्ययान्त क्रियावाची शब्द अव्यय होता है।)

आत्मदर्शी दुग्धं पीत्वा क्रीडति = आत्मदर्शी दूध पीकर खेलता है।
को जानाति सुप्त्वा को जागरिष्यति = कौन जानता है सोकर कौन जगेगा ?
आर्य इष्ट्वैव भुङ्क्ते = आर्य (श्रेष्ठ व्यक्ति) यज्ञ करके ही भोजन करता है।
शिष्टो बालो पितरौ नत्वा विद्यालयं गच्छति = शिष्ट बच्चा मां-बाप को नमन करके विद्यालय को जाता  है।
व्याख्यानं श्रुत्वा प्रबुद्धः श्रोतृगणः शंकां पृच्छति = व्याख्यान सुनकर प्रबुद्ध श्रोता प्रश्न पूछता है।
सत्यस्य बोधाय विदुषः समीपं गत्वा धर्मचर्चां कुर्यात् = सत्य के बोध के लिए विद्वानों के पास जाकर धर्मचर्चा करनी चाहिए।
प्रत्यहं स्वाध्यायं कृत्वा ज्ञानं वर्धयेत् = प्रतिदिन स्वाध्याय करके ज्ञान को बढ़ाना चाहिए।
गृहस्थी प्रतिदिनं पञ्चमहायज्ञान् कृत्वैव सुखं लभते = गृहस्थी प्रतिदिन पांच महायज्ञों को करके ही सुख प्राप्त करता है।
मृत्वाऽपि यो यशःकायेन जीवति स जीवति = जीना…

पाठ: (37) कृदन्त (4) निष्ठा प्रत्यय

चित्र
(क्त प्रत्यय भाव में। अकर्मक धातुओं से क्त प्रत्यय भाव में होता है। सकर्मक धातुओं में भी जब कर्म की अविवक्षा होती है, तब सकर्मक धातुओं से भी क्त प्रत्यय भाव में हो सकता है। भाव में क्त प्रत्ययान्त क्रिया नित्य ही नपुंसकलिंग एकवचन में होती है, तथा कर्त्ता में तृतीया विभक्ति होती है।)

बुभुक्षया बालेन रुदितम् = भूख के कारण बच्चे के द्वारा रोया गया।
अध्यापकस्याऽनुपस्थितौ बालैः जल्पितम् = अध्यापक के अनुपस्थित होने से बच्चों के द्वारा गपशप की गई।
आतंकवादिनो मुक्तिं श्रुत्वा जनैर्भृशमाक्रुष्टम् = आतंकवादी की रिहाई सुनकर लोगों के द्वारा खूब आक्रोश किया गया।
वने सिंहं दृष्ट्वा भीतेन भृशं धावितम् = वन में शेर को देखकर डरे हुए व्यक्ति के द्वारा खूब दौड़ा गया।
पदं मिथ्याकरणात् शिक्षकेण क्रुद्धम् = शब्द का गलत उच्चारण करने से शिक्षक ने गुस्सा किया।
गुरुकुले यत् भुक्तं पीतं तप्तं जल्पितमटितं तन्न प्रस्मर्यते = गुरुकुल में जो खाया-पीया, तप किया, बातें की, घूमे वह भूला नहीं जा रहा है।
स्थालीपक्वमेव पितामहो भुङ्क्ते = दादाजी बटलोई का पका ही खाते हैं।
चुल्लीपक्वं सुपाच्यं मधुरञ्च भवति = चूल्हे में पकाया…

पाठ: (36) कृदन्त (3) निष्ठा प्रत्यय

चित्र
(क्त प्रत्यय कर्तृवाच्य विशेषणरूप प्रयोग)
बाला महाविद्यालयं गता = बालिका कॉलेज गई।
महाविद्यालयं गतां बालिकां माता सप्ताहात् प्रतीक्षते, साऽधुनापि न प्रत्यावर्तिता = कॉलेज गई हुई बालिका की मां हप्तेभर से प्रतीक्षा कर रही है, वह अभी भी लौटकर नहीं आई।

रामः दुष्टोऽस्ति = राम दुष्ट है।
दुष्टं रामं पिता तस्य दुष्टतायै ताड़यति = दुष्ट राम को पिता उसकी दुष्टता के कारण से पीट रहा है।

महामार्यां नैके जनाः मृताः = महामारी में कई लोग मर गए।
महामार्यां मृतेभ्यः जनेभ्यः सर्वकारः कालोचितं क्रियाकलापमकार्षीत् = महामारी में मरे हुए लोगों के लिए सरकार ने यथोचित कदम उठाए।

विभीषिका प्रथिताऽस्ति यत् आंग्लभाषयैव जनः शिष्ट इति = हौवा फैला हुआ है कि अंग्रेजी से ही व्यक्ति शिष्ट बन सकता है।
प्रथितायाः विभीषिकायाः दूरिकरणमस्माकं कर्त्तव्यमस्ति = फैले हुए हौवे को दूर करना हमारा कर्त्तव्य है।

विद्वान् गृहमागतः = विद्वान् घर आ गया।
गृहमागतो विद्वान् एवाऽतिथिः कथ्यते = घर पर आया हुआ विद्वान् ही अतिथि कहलाता है।

आत्मदर्शी रात्रौ दशवादने सुप्तः = आत्मतदर्शी रात दस बजे सो गया।
सुप्तः आत्मदर्शी निद्रायां द्विचक्रिकामची…

पाठ: (35) कृदन्त (2) निष्ठा प्रत्यय

चित्र
(क्त प्रत्यय कर्त्तृवाच्य- अकर्मक धातुएं तथा श्लिष्, शीङ्, स्था, आस्, वस्, जन्, रुह्, जॄ, इन धातुओं से क्त प्रत्यय कर्त्तृवाच्य में भी होता है।)
क्त प्रत्यय कर्त्तृवाच्य क्रियारूप प्रयोग:-
आचार्यमहोदयः ऑस्ट्रेलियादेशम् अगच्छत् = आचार्य जी ऑस्ट्रेलिया गए।
आचार्यमहोदयः ऑस्ट्रेलियादेशम् गतः = आचार्य जी ऑस्ट्रेलिया गए।
ह्यः अहं मशकजालं विनैवाऽस्वाप्सम्/सुप्तः सुप्ता वा = कल मैं मच्छरदानी के बिना ही सो गया/गई।
पितृभ्यां वियुक्तः स बालः रात्रौ पद्यायामेवाऽशयिष्ट शयितो वा = माता-पिता से बिछुड़ा हुआ वह बच्चा रात पादचारी सड़क पर ही सोया।
महदाश्चर्यं यत् मार्जारकुक्कुटौ सह अशायाताम् शयितौ वा = बड़ा ही आश्चर्य है कि बिल्ली और कुत्ता साथ-साथ सोए।
निषद्यायामप्राप्तायां स्थानाभावाच्च यात्रिणः रेलयाने शौचालयसमीपमपि अस्वाप्सुः सुप्ताः वा = सीट न मिलने पर तथा स्थानाभाव के कारण ट्रेन में यात्री शौचालय के पास भी सो गए।
अवकाशे बालकाः वैदिकसंस्कृतेः ज्ञानार्थं शिविरमयुः याताः वा = छुट्टियों में बच्चे वैदिक संस्कृति को जानने हेतु शिविर में गए।
शिविरात् पुनः पित्रा सह सप्तदिनेषु गृहमागमन् आगताः वा = सात दिन के बाद फिर…

पाठ: (34) कृदन्त 1 (निष्ठा प्रत्यय)

चित्र
(व्याकरण में क्त तथा क्तवतु प्रत्यय की निष्ठा संज्ञा है। सामान्य रूप से दोनों प्रत्ययों का प्रयोग भूतकाल दर्शाने के लिए होता है। क्तवतु प्रत्यय कर्तरि वाच्य में तथा क्त प्रत्यय कर्म व कतृवाच्य में प्रयुक्त होता है। दोनों प्रत्ययों से निर्मित कृदन्त शब्द स्वतन्त्र क्रिया के रूप में भी प्रयुक्त होते हैं, तथा विशेषण रूप में भी यथा:- 

क्रियारूप में प्रयोग = रामः गतवान्/गतः = राम गया।
विशेषणरूप में प्रयोग = गतवन्तं/गतं रामं शोचति = गए हुए राम का शोक करता है।

कर्मवाच्य में क्त प्रत्यय =
यदि क्त प्रत्ययान्त शब्द क्रिया के रूप में प्रयुक्त है, तब कर्त्ता में तृतीया, कर्म में प्रथमा तथा क्तान्त क्रिया शब्द के लिङ्ग-वचन-विभक्ति कर्म के अनुसार होंगे, और यदि क्तान्त शब्द के विशेषण होने पर उसके लिङ्ग-वचन-विभक्ति विशेष्य के अनुसार होंगे।)

(क्त प्रत्यय कर्मवाच्य में क्रियारूप प्रयोग)

अहं पाठं लिखामि = मैं पाठ लिख रहा/रही हूं।
मया पाठः लिखितः = मेरे द्वारा पाठ लिखा गया।

रामः रोटिकां खादति = राम रोटी खा रहा है।
रामेण रोटिका खादिता = राम के द्वारा रोटी खाई गई।

चित्रकारः चित्रं करोति = चित्रकार चित्र बना रहा है।

पाठ: (33) भाववाच्य

चित्र
(क्रिया को प्रधानरूप से कहने के लिए भाववाच्य का प्रयोग होता है। भाववाच्य का प्रयोग अकर्मक धातुओं से होता है। कर्म की अविवक्षा होने पर सकर्मक धातु भी अकर्मक मानी जाती है। ऐसी अकर्मक धातुओं से भी भाववाच्य का प्रयोग होता है। भाववाच्य में क्रिया नित्य ही आत्मनेपद प्रथमपुरुष एकवचन में होती है। कर्ता में तृतीया विभक्ति का प्रयोग होता है। भाववाच्य में कर्म कारक नहीं होता।)
अहं हसामी = मैं हंस रही हूं।
मया हस्यते = मेरे द्वारा हंसा जा रहा है।
वयं धावामः = हम दौड़ रहे हैं।
अस्माभिर्धाव्यते = हमारे द्वारा दौड़ा जा रहा है।
बालकाः अकूर्दन्त = बच्चे कूदे।
बालकैरकूर्द्यत = बच्चों के द्वारा कूदा गया।
रात्रौ शीघ्रं स्वप्यात् ब्रह्ममुहूर्ते च जागृयात् एष एव शिष्टाचारः = रात को जल्दी सोएं और ब्रह्ममुहूर्त में उठ जाएं यही शिष्टाचार है।
रात्रौ शीघ्रं सुप्येत ब्रह्ममुहुर्ते च जागर्येत एष एव शिष्टाचारः = रात को जल्दी सोया जाना चाहिए तथा ब्रह्ममुहुर्त में जग जाना चाहिए यही शिष्टाचार है।
आलस्यात् अलसो जृम्भते = आलस्य के कारण आलसी जंभाई ले रहा है।
आलस्यात् अलसेन जृम्भ्यते = आलस्य के कारण आलसी के द्वारा जंभाई ली जा रही ह…

पाठ: (32) कर्मवाच्य (पॅसिव्ह वॉईस)

चित्र
(कर्म को प्रधान रूप से कहने के लिए कर्मवाच्य का प्रयोग होता है। कर्मवाच्य में कर्ता में तृतीया, कर्म में प्रथमा तथा क्रिया कर्म के अनुसार चलती है। सकर्मक धातुओं का ही कर्मवाच्य में प्रयोग होता है तथा धातु से आत्मनेपद होता है।)
रामः (कर्ता) रोटिकां (कर्म) खादति (क्रिया) = राम रोटी खा रहा है। (कतृवाच्य प्रयोग)
रामेण रोटिका खाद्यते = राम के द्वारा रोटी खाई जाती है।
अहं पाठं लिखामि = मैं पाठ लिख रही हूं।
मया पाठः लिख्यते = मेरे द्वारा पाठ लिखा जा रहा है।
आत्मदर्शी प्रातः दुग्धम् अपिबत् = आत्मदर्शी ने सुबह दूध पीया।
आत्मदर्शिना प्रातः दुग्धम् अपीयत = आत्मदर्शी के द्वारा सुबह दूध पीया गया।
छात्राः सर्वा श्वः यज्ञार्थं नगरं गमिष्यन्ति = सभी छात्राएं कल यज्ञ के लिए शहर जाएंगी।
छात्राभिः सर्वाभिः श्वः यज्ञार्थं नगरं गमिष्यते = सभी छात्राओं के द्वारा यज्ञ के लिए कल शहर जाया जाएगा।
कृषकः हलेन क्षेत्रम् कर्षति = किसान हल से भूमि जोतता है।
कृषकेन हलेन क्षेत्रम् कृष्यते = किसान के द्वारा हल से भूमि जोती जा रही है।
श्रेष्ठी निर्धनेभ्यः कम्बलानि ददाति = श्रेष्ठी गरीबों को कम्बल दे रहा है।
श्रेष्ठिना निर्धनेभ्यः …

पाठ: (31) सप्तमी विभक्ति (4)

चित्र
(निमित्त, हेतु, सम्प्रदान आदि के वाचक शब्दों में चतुर्थी के स्थान में सप्तमी का प्रयोग भी देखा जाता है।)
समित्सु आम्रमुत्पाटयति = समिधाओं के लिए आम के पेड़ को फाड़ रहा है।
केशेषु मेषान् पालयति मेषपालः = गड़रिया बालों के लिए भेड़ को पालता है।
धने रागिणः वृक्कं चोरयति वैद्यः = वैद्य धन के लिए रोगी की किड़नी चुराता है।
सम्माने बुधो धनिनो मिथ्यां प्रशंसति = सम्मान के लिए विद्वान् धनी लोगों की मिथ्या प्रशंसा करता है।
पुष्पेषु पाटलान् वपति = पुष्पों के लिए गुलाब के पौधों को बो रहा है।
कर्गलेषु वृक्षान् कर्तयति = कागजों के लिए पेड़ काट रहा है।
उद्योगेषु मूर्खाः क्षेत्रं विक्रीणते = कारखाने के लिए मूर्ख लोग खेत बेचते हैं।
विलासितायां प्राकृतिक-सम्पदं दुहन्ति मूढाः = मूढ़ लोग ऐशो-आराम के लिए प्राकृतिक सम्पदा का दोहन करते हैं।
रे मूर्ख ! पाके कपाटं मा ज्वालय = मूर्ख ! (खाना) पकाने के लिए किवाड़ को मत जला।
चर्मणि द्विपिनं हन्ति दन्तयोर्हन्ति कुञ्जरम्।
केशेषु चर्मरीं हन्ति सीम्नि पुष्कलको हतः।। = लोग चमड़े के लिए चीते को मारते हैं, दातों के लिए हाथी को मारते हैं, केशों के लिए चंवरी गाय को मारते हैं और कस्तुरी के लिए…