पाठ: (33) भाववाच्य


(क्रिया को प्रधानरूप से कहने के लिए भाववाच्य का प्रयोग होता है। भाववाच्य का प्रयोग अकर्मक धातुओं से होता है। कर्म की अविवक्षा होने पर सकर्मक धातु भी अकर्मक मानी जाती है। ऐसी अकर्मक धातुओं से भी भाववाच्य का प्रयोग होता है। भाववाच्य में क्रिया नित्य ही आत्मनेपद प्रथमपुरुष एकवचन में होती है। कर्ता में तृतीया विभक्ति का प्रयोग होता है। भाववाच्य में कर्म कारक नहीं होता।)
अहं हसामी = मैं हंस रही हूं।
मया हस्यते = मेरे द्वारा हंसा जा रहा है।
वयं धावामः = हम दौड़ रहे हैं।
अस्माभिर्धाव्यते = हमारे द्वारा दौड़ा जा रहा है।
बालकाः अकूर्दन्त = बच्चे कूदे।
बालकैरकूर्द्यत = बच्चों के द्वारा कूदा गया।
रात्रौ शीघ्रं स्वप्यात् ब्रह्ममुहूर्ते च जागृयात् एष एव शिष्टाचारः = रात को जल्दी सोएं और ब्रह्ममुहूर्त में उठ जाएं यही शिष्टाचार है।
रात्रौ शीघ्रं सुप्येत ब्रह्ममुहुर्ते च जागर्येत एष एव शिष्टाचारः = रात को जल्दी सोया जाना चाहिए तथा ब्रह्ममुहुर्त में जग जाना चाहिए यही शिष्टाचार है।
आलस्यात् अलसो जृम्भते = आलस्य के कारण आलसी जंभाई ले रहा है।
आलस्यात् अलसेन जृम्भ्यते = आलस्य के कारण आलसी के द्वारा जंभाई ली जा रही है।
सर्वोऽपि काले जीर्यति = समय आने पर सब बूढे़ होते हैं।
सर्वेणाऽपि काले जीर्यते = समय आने पर सभी के द्वारा वृद्ध हुआ जाता है।
नवागन्तुकाद् बालोऽभैषीत् = अजनबी से बालक डर गया।
नवागन्तुकाद् बालेनाऽभायि = अजनबी से बालक डर गया।
तृषातुरः कदापि न तोक्ष्यति = प्यासा कभी तृप्त नहीं होगा।
तृषातुरेण कदापि न तोक्ष्यते = प्यासे के द्वारा कभी तृप्त नहीं हुआ जाएगा।
अराजकतया जनता त्रस्यति = अराजकता के कारण जनता त्रस्त है।
अराजकतया जनतया त्रस्यते = अराजकता के कारण जनता त्रस्त हो रही है।
प्राथम्यात् वेदिकात् प्रवचनेन बालिका लज्जते = प्रथम अनुभव के कारण मंच से बोलने में बालिका को शरम आ रही है।
प्राथम्यात् वेदिकात् प्रवचनेन बालिकया लज्ज्यते = प्रथम अनुभव के कारण मंच से बोलने में बालिका द्वारा लज्जित हुआ जा रहा है।
पथभ्रष्टः प्रत्यावर्तेत = पथभ्रष्ट को लौट आना चाहिए।
पथभ्रष्टेन प्रत्यावृत्येत = पथभ्रष्ट के द्वारा लौट आना चाहिए।
स्वप्नक् स्वप्नेषु लोटति = ख्वाबों का शहंशाह ख्वाबों में लोट-पलोट लगा रहा है।
स्वप्नजा स्वप्नेषु लुट्यते = ख्वाबों के शहंशाह द्वारा ख्वाबों में लोट-पलोट लगाई जा रही है।
मूले सति छिन्नोऽपि तरुः रोहति = जड़ के रहने पर कटा हुआ पेड़ भी पुनः उग आता है।
मूले सति छिन्नेनापि तरुणा रुह्यते = जड़ के रहने पर कटे हुए पेड़ द्वारा भी पुनः उगा जाता है।
छिद्रवदेकेन दुर्गुणेनापि सर्वे गुणाः स्रवन्ति = जैसे एक छेद के कारण घड़े से सारा पानी बह जाता है वैसे ही एक दुर्गण के कारण व्यक्ति के सारे गुण नष्ट हो जाते हैं।
छिद्रवदेकेन दुर्गुणेनापि सर्वैर्गुणैः स्रूयते = छेदवाले घड़े के पानी के समान व्यक्ति के एक ही दुर्गुण से भी सारे गुण नष्ट हो जाते हैं।
अनवधानेन कदलीवल्कले पदनिधानेन पान्थोऽस्खालीत् = असावधानी के कारण केले के छिलके पर पैर रखने से पथिक फिसल गया।
अनवधानेन कदलीवल्कले पदनिधानेन पान्थेनाऽस्खालि = असावधानी में केले के छिलके पर पैर रखे जाने से पथिक द्वारा फिसला गया।
ह्रदे आमूर्ध्नः स्नायात् = तालाब में डूबकर नहाना चाहिए।
ह्रदे आमूर्ध्नः स्नायेत = तालाब में डूबकर नहाया जाना चाहिए।
दिवा मा स्वाप्सीः = दिन में मत साओ।
दिवा मा स्वापि = दिन में नहीं सोया जाना चाहिए।
अधोमुखं मा शेताम् = औंधे मुख मत सोओ।
अधोमुखं मा शय्यताम् = औंधे मुख नहीं सोया जाना चाहिए।
स्थित्वा मा भुङ्क्ष्व = खड़े-खड़े मत खा।
स्थित्वा मा भुज्यताम् = खड़े रहकर नहीं खाया जाना चाहिए।
मा गृधः = लोभ मत कर।
मा गार्धि = लोभ नहीं किया जाना चाहिए।
तिष्ठन् मा मूत्रयेत् = खड़े होकर लघुशंका न करे।
तिष्ठता मा मूत्र्येत = खड़े होकर लघुशंका न की जाए।
कांस्यपात्र्यां खादेत् = कांसे के पात्र में खाए।
कांस्यपात्र्यां खाद्येत = कांसे के पात्र में खाया जाना चाहिए।
पथि वामपक्षी स्यात् = रास्ते में बायीं ओर से चले।
पथि वामपक्षिणा भूयेत = रास्ते में बायीं ओर से चला जाए।
रक्तसंकेते तिष्ठतु हरिते च चलतु = लालबत्ती के संकेत पर रुक जाएं हरीबत्ती होने पर चलें।
रक्तसंकेते स्थीयताम् हरिते च चल्यताम् = लालबत्ती के संकेत पर रुका जाना चाहिए तथा हरीबत्ती पर चला जाना चाहिए।
रिक्ते गेहे गुञ्जति शब्दाः = खाली घर में बोल गूंजते हैं।
रिक्ते गेहे गुञ्ज्यते शब्देन = खाली घर में शब्दों द्वारा गुंजन होता है।
आतपात् म्लायति माला =धूप के कारण माला मुरझा रही है।
आतपात् म्लायते मालया = धूप के कारण माला द्वारा मुरझाया जा रहा है।
गर्जन् मेघो न वर्षति = गरजता बादल बरसता नहीं है।
गर्जता मेघेन न वृष्यते = गरजते बादल के द्वारा बरसा नहीं जाता।
कदाचित् गर्जन् मेघोऽपि वर्षति = कभी-कभी गरजता बादल भी बरस जाता है।
कदाचित् गर्जता मेघेनापि वृष्यते = कभी-कभी गरजते बादल के द्वारा भी बरसा जाता है।
आपदां कथितः पन्था इन्द्रियाणामसंयमः।
तज्जयः सम्पदां मार्गो येनेष्टं तेन गम्यताम्।। = इन्द्रियों का असंयम असंख्य आपत्तियों को बुलावा है जबकि इन्द्रिय-संयम सम्पत्तियों भरा मार्ग है। दोनों में से तुम्हें जो पसन्द हो उसी पर गमन करो।
तादृशी भूयते बुद्धिर्व्यवसायोऽपि तादृशः।
सहायास्तादृशा एव यादृशी भवितव्यता।। = जैसी होनहार होती है, मनुष्य की बुद्धि भी वैसी ही हो जाती है। उसके निर्णय, साधन तथा सहायक भी वैसे ही होते चले जाते हैं।
दिवा दृश्यते नोलूकेन काकेन नक्तं न दृश्यते।
अपूर्वेण कामान्धेन दिवा नक्तं न दृश्यते।। = उल्लू को दिन में तथा कौए को रात में दिखाई नहीं देता, जबकि कामान्ध व्यक्ति को रात और दिन दोनों में ही नहीं दिखाई देता।
न दृश्यते जन्मान्धेन कामान्धेन न दृश्यते।
नैव दृश्यते मत्तेन न चार्थी दोषान् पश्यति।। = जन्मान्ध को दिखाई नहीं देता, कामान्ध को दिखाई नहीं देता, नशेबाज को दिखाई नहीं देता तथा स्वार्थी को भी दोष दिखाई नहीं देते।
कल्पकोटिशतैरपि नाभुक्तेन कर्मणा क्षीयते। = करोड़ों कल्प बीत जाने पर भी बिना भोगे कर्म नष्ट नहीं होते।
एतेनाऽमर्त्येन देवेन पर्णवीरिव डीयते। = इस अविनाशी जीव के द्वारा पक्षी की भांति उड़ा जा रहा है।
दीपो भक्षयते ध्वान्तं कज्जलं च प्रसूयते।
यदन्नं भक्षयेन्नित्यं भूयते तादृशी प्रजा।। = जैसे दिया अंधेरा खाता है और काजल उत्पन्न करता है, इसी प्रकार मनुष्य जैसा अन्न खाता है उसकी विचाररूपी सन्तान भी वैसी ही होती है।
मलिनचेतसि बुद्धिप्ररोहेण न भूयते। = मैले चित्त में बुद्धि (ज्ञान) का अंकुरण नहीं होता।
गामश्वं पुरुषं पशुमहरहर्नयमानेन वैवस्वतेन न तृप्यते सुराया इव दुर्मदिना। = जैसे पियक्कड शराब से तृप्त नहीं होता, वैसे ही प्रतिदिन गाय, अश्व, पुरुष आदि प्राणियों को ले जानेवाला यम भी तृप्त नहीं होता।
सन्ध्या येन न विज्ञाता सन्ध्या येनानुपासिता।
जीवमानो भवेच्छूद्रो मृतः श्वा चैव भूयते।। = जिसने संध्या की महिमा को नहीं जाना, जीवन में कभी संध्योपासना नहीं की, वह जीते जी शूद्र हो जाता है और मरने के बाद कुत्ता बन जाता है।
यः सर्वभूतेभ्योऽभयं दत्त्वा चरति, तेन कदाचिदपि केनापि न भीयते। = जो समस्त प्राणियों को अभयदान देकर चलता है, उसे कभी भी किसी से भय नहीं होता।
बोधयन्ति न याचन्ते भिक्षाद्वारा गृहे गृहे।
दीयतां दीयतां नित्यमदातुः फलमीदृशम्।। = भिक्षुक लोग भीख नहीं मांगते हैं, अपितु वे घर-घर जाकर भिक्षा मांगते हुए लोगों को बोध प्रदान करते हैं कि सदा दान दिया करो क्योंकि दान न देनेवाले की दुर्गति हमारे जैसी ही होती है।



संस्कृतं वद आधुनिको भव।
वेदान् पठ वैज्ञानिको भव।।

इति

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