पाठ: (14) चतुर्थी विभक्ति(1)


(जिसको लक्षित करके क्रिया की जाए, उसकी सम्प्रदान संज्ञा होती है। सम्प्रदान कारक में चतुर्थी विभक्ति होती है।)
माता माणवकाय मोदकं यच्छति = माता बच्चे को लड्डू देती है।
राता राङ्कवेभ्यः रातिं राति = दाता कम्बलों के लिए दान दे रहा है।
रैपतिः रोगिभ्यः रुप्यकाणि अरात् = धनपति ने रोगियों को पैसे दिए।
गालिवन्तः सर्वेभ्यः गालिं ददाति = गाली बकनेवाले सभी को गाली देते हैं।
सुदामा कृष्णाय तण्डुलान् ददे = सुदामा ने कृष्ण को चावल दिए।
दिव्या दरिद्राय द्रविणं ददते = दिव्या गरीब को धन देती है।
द्रुपदः अर्जुनाय द्रौपदीम् अददत् = द्रुपद ने अर्जुन को द्रौपदी दी।
संन्यसितुकामः सर्ववेदसं सर्वेभ्यः ददिष्यते = संन्यास की कामनावाला सकल धनसम्पत्ति सभी को देगा।
नचिकेता पितरं होवाच कस्मै मां दास्यति ? = नचिकेता ने पिता से पूछा मुझे (आप) किसे दोगे ?
स होवाच मृत्यवे त्वा ददामि = उसने कहा मैं तुझे मृत्यु को देता हूं।
वाजश्रवसः ब्राह्मणाय पीतोदकाः जग्धतृणाः दुग्धदोहाः निरिन्द्रियाः गाः ररौ = वाजश्रवस् ने ब्राह्मणों को जो पानी पी चुकी हैं, घास खा चुकी हैं, जिनका दूध दुहा जा चुका है, जो शिथिल इन्द्रियोंवाली हैं एसी बूढी गाएं दान में दीं।
श्वः भरतः रामाय राज्यं रास्यति = कल भरत राम को राज्य देगा।
चाण्क्यः चन्द्रगुप्ताय नन्दराज्यम् अरासीत् = चाणक्य ने चन्द्रगुप्त को नन्दराज्य दिया।
दुर्योधनः पाण्डवेभ्यः सूचिकाग्रम् अपि राज्यं न अददिष्ट = दुर्योधन ने पाण्डवों को सुई की नोक जितना भी राज्य नहीं दिया।
विश्पतिः विशे वेदान् सनोति = प्रजाओं का स्वामी प्रजाओं के लिए वेदज्ञान देता है।
श्रीमान् स्वर्गाय श्रियं सनिष्यति = धनवान् स्वर्ग के लिए श्री को देगा।
जातवेदसे सुनवाम सोमम् = उत्पन्न हुए समस्त पदार्थों को प्राप्त ईश्वर के लिए श्रेष्ठ पदार्थ समर्पित करें।
श्रीकामः पात्राय सातिं सनुयात् सर्वदा = धन की कामनावाला पात्र व्यक्ति को सदा दान देवे।
ईश्वरः ऋषिभ्यः वेदान् उपदिशति = ईश्वर ऋषियों को वेदोें का उपदेश देता है।
कथिकः अस्मभ्यं कथाः कथयति = कथाकार हमें कथाएं सुनाता है।
कथाकारः बालकेभ्यः लघुकथाः अचीकथत् = कथाकार ने बच्चों के लिए लघुकथाएं कहीं।
सृष्ट्यादावीश्वरः अन्तःप्रेरणया ऋषिभ्यः ज्ञानं ददाति = आदि सृष्टि में ईश्वर ऋषियों को अन्तःप्रेरणा से ज्ञान देता है।
रामः सुग्रीवाय कपिराज्यम् अयच्छत् = राम ने सुग्रीव को वानरराज्य प्रदान किया।
वीराः स्वमातृभूमये स्वजीवनं ददुः = वीरों ने मातृभूमि को जीवनदान किया।
एकलव्यः द्रोणाय स्वाङ्गुलिं समर्पयत् = एकलव्य ने द्रोण को अपनी ऊंगली समर्पित की।
राजा रघुः कौत्साय धनं ददौ = राजा रघु ने कौत्स को धन दिया।
पापाचारात् मेघा अपि रुष्टाः, कृषये जलं न सिञ्चन्ति = पाप बढ़ने से बादल भी रूठ गए हैं, खेतों को पानी नहीं पिला रहे।
यज्ञाभावात् पर्जन्यः प्रजायै जलं न प्रयच्छति = यज्ञों के अभाव के कारण प्रजा को वर्षा पानी नहीं दे रही है।
अम्भोदवर ! चक्रवाकाय जलं प्रयच्छ = हे मेघराज, चकवे को पानी दे दो !
भगवान् सूर्यः कर्णाय कुण्डलं तनुत्रं च अदात् = भगवान् सूर्य ने कर्ण को कुण्डल और कवच दिए।
अहम् भूमिम् अददाम् आर्याय = मैंने (ईश्वरने) पृथ्वी आर्यों के लिए दी है।
अहं वृष्टिम् अददां दाशुषे मर्त्याय = मैंने (ईश्वरने) वृष्टि दानी मनुष्यों के लिए दी है। परोपकारी महानुभावों के कारण वर्षा हो रही है)
अहम् दाशुषे विभजामि भोजनम् = मैं (ईश्वर) दानी (परोपकारी) को भोजन देता हूं।
मेधां मे देहि = मुझे मेधाबुद्धि प्रदान करो।
यस्मै देवाः प्रयच्छन्ति पुरुषाय पराभवम्।
बुद्धिं तस्यापकर्षन्ति सोऽवाचीनानि पश्यति।। = देवगण जिस पुरुष को पराजय देते हैं (नष्ट करना चाहते हैं), उसकी बुद्धि को नष्ट कर देते हैं, (अतः) वह अवनति को प्राप्त होता है।
गृहं समागताय बुधाय पाद्यम् अर्घ्यं च दद्यात् = घर आए हुए विद्वान् को पैर एवं हाथ-मुख धोने के लिए पानी देवे।
चित्तनदी नाम उभयतो वाहिनी, वहति कल्याणाय वहति पापाय च = चित्तरूपी नदी दो दिशाओं में प्रवाहित होती है, कल्याण के लिए बहती है और पाप के लिए भी बहती है।
कैवल्यप्राग्भारा विवेकविषयनिम्ना सा चित्तनदी कल्याणाय वहति = कैवल्य (मुक्ति) की ओर ले जानेवाली विवेकयुक्त वह चित्तनदी की धारा कल्याण के लिए बहती है।
संसारप्राग्भारा अविवेकविषयनिम्ना सा पापाय वहति = संसार की ओर ले जानेवाली अविवेक से युक्त वह पाप के लिए बहती है (अवनति की ओर ले जाती है)।
सर्वार्थसिद्धये सर्वभूतानाम् आत्मनश्च सुखावहम् आचरणं कुर्यात् = सकल अर्थों (प्रयोजनों) की सिद्धि के लिए समस्त प्राणियों के लिए तथा अपने लिए जो सुखदायक आचरण है, उसे करना चाहिए।
आपदाय धनं रक्षेत् = आपत्तिकाल के लिए धन बचाकर रखे।
हिरण्याय अनृतं मा वद = पैसे के लिए झूठ मत बोल।
राधसे जज्ञिषे = तू सिद्धि प्राप्त करने के लिए पैदा हुआ है।
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे।। = सज्जनों की रक्षा के लिए, दुष्टों के विनाश के लिए, धर्म की स्थापना हेतु मैं (ईश्वर) युग युग में (श्रेष्ठ लोगों को) उत्पन्न करता हूं।
मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद् यतति सिद्धये = हजारों में से कोई एक ही योग की सिद्धि के लिए प्रयत्न करता है।
अन्नपते अन्नस्य नो देह्यनमीवस्य शुष्मिणः = हे अन्न के स्वामी ! हमें आरोग्यदायक, बलदायक अन्न दो।
प्रभो मे देहि विज्ञानम् = हे प्रभो ! मुझे विशिष्ट ज्ञान प्रदान करो।
मानवाः दहनायैव शिरसा काष्ठानि वहन्ति = मनुष्य जलाने के लिए सिर पर लकड़ियां ढोते हैं।
प्राज्ञः स्वकार्यसम्पादनाय रिपूनपि स्वकन्धेन वहेत् = बुद्धिमान् व्यक्ति अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए शत्रु को भी अपने कन्धे पर ले जाए।
मेधां मे वरुणो ददातु मेधामग्निः प्रजापतिः।
मेधामिन्द्रश्च वायुश्च मेधां धाता ददातु मे।। = वरुण (अतिश्रेष्ठ परमात्मा) मुझे श्रेष्ठ बुद्धि प्रदान करे। ज्ञानस्वरूप परमात्मा मुझे ज्ञान ग्रहण करनेवाली बुद्धि प्रदान करे। परमैश्वर्यशाली एवं परम शक्तिशाली परमात्मा मुझे ऐश्वर्य व बल देनेवाली बुद्धि प्रदान करे। जगत् के धर्त्ता मुझे धारणावती बुद्धि प्रदान करे।
यद् भद्रं तन्न आसुव = जो कुछ भी कल्याणकारी है वह हमें प्राप्त कराइए।
शंयोरभिस्रवन्तु नः = हमारे लिए लौकिक एवं मोक्ष दोनों प्रकार के सुखों की सभी ओर से वर्षा कीजिए।
यत्कामास्ते जुहुमस्तन्नो अस्तु = जिस जिस कामनावाले होकर हम तुझे समर्पण करें, वह वह हमारी कामना पूर्ण होवे।
शं नोऽस्तु शं द्विपदे शं चतुष्पदे = हमारे लिए आप कल्याणकारी होवें, दो पैरवाले और चार पैरवाले अर्थात् प्राणिमात्र के लिए आप कल्याणकारी होवें।
सा विद्या या विमुक्तये = वह विद्या कहाती है जो मुक्तिदायक होती है।
सर्वज्ञः मर्त्याय सप्तमर्यादां व्यतनोत् = सर्वज्ञ परमेश्वर ने मरणधर्मा मानवों के लिए सात मर्यादाएं बनाईं।
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः।। = वह बात जान ले कि समर्पण, प्रश्नोत्तर व सेवा करने से तत्त्वज्ञानी तुझे ज्ञान का उपदेश करेंगे।
इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूनवे = दोषदृष्टि से रहित तुझे यह गूढतम ज्ञान अवश्य बतलाऊंगा।
विद्या ह वै ब्राह्मणमाजगाम गोपाय मा शेवधिष्टेऽहमस्मि। असूयकायाऽनृजवेऽयताय न मा ब्रूया वीर्यवती तथा स्याम् = विद्या ब्राह्मण के पास जाकर कहती है- तू मेरी रक्षा कर, मैं तेरा खजाना हूं। निन्दा करनेवाले, हठी, असंयमी को मुझे मत देना, जिससे कि मैं बलवती बनी रहूं।
नावैयाकरणाय नानुपसम्पन्नाय अनिदंविदे वा निरुक्तविद्या निर्ब्रूयात् = अवैयाकरण को, शिष्यभाव को न प्राप्त व्यक्ति को तथा शब्द की ऊहा करने में असमर्थ व्यक्ति को निरुक्तविद्या न कहे।
वेदान्ते परमं गुह्यं पुराकल्पे प्रचोदितम्।
नाप्रशान्ताय दातव्यं नापुत्रायाशिष्याय वा पुनः।। = प्राचीनकाल में वेदान्तशास्त्र में अत्यन्त गूढ़ ज्ञान का वर्णन किया गया था। वह ज्ञान अशान्त व्यक्ति को जो पुत्र अथवा शिष्य नहीं है, उसे नहीं देना चाहिए।
मातेव पुत्रान् रक्षस्व श्रीश्च प्रज्ञां च विधेहि नः = माता के समान हम पुत्रों की रक्षा कर, लक्ष्मी, शोभा, कान्ति तथा प्रज्ञा को हमारे लिए सम्पादित कर।

आचार्या शीतल जी आर्ष गुरुकुल अलियाबाद
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