पाठ: (16) चतुर्थी विभक्ति (3)


(स्पृह् धातु के साथ इष्ट वस्तु की सम्प्रदान संज्ञा होती है, अतः उसमें चतुर्थी विभक्ति का प्रयोग होता है।)
सुधा सुधायै स्पृहयति = सुधा अमृत को चाहती है।
यशस्वी यशसे स्पृहयति = यशस्वी यश को चाहता है।
न जातुचित् धनाय अस्पृहम् अहम् = मैंने कभी धन को नहीं चाहा।
महाकुलेभ्यः स्पृहयन्ति देवाः धर्मार्थनित्याश्च बहुश्रुताश्च = धर्म अर्थ में नित्य प्रवृत्त और बहुज्ञानी विद्वान् लोेग श्रेष्ठ कुलों को चाहते हैं।
न दुरुक्ताय स्पृहयेत् = दुष्ट वचन कहनेवाले को न चाहें।
इच्छन्ति देवाः सुन्वन्तं न स्वप्नाय स्पृहयन्ति = देव लोग यज्ञ करनेवालों को चाहते हैं, आलसी याने सुस्तों को नहीं।
कस्यचिद् धनं भो..? कथं धनाय स्पृहयति ? = धन किसका है भाई..? क्यों धन को चाहते हो ?
ज्ञानाय स्पृहय, तदेव सन्मित्रम् = ज्ञान को चाहो, वही सच्चा साथी है।
गर्धी सदैव परकीयाय धनाय स्पृहयिष्यति = लोभी सदैव पराए धन को चाहेगा।
भरतः रामाय राज्यम् अपीस्पृहत् = भरत ने राम के लिए राज्य चाहा।
दुर्योधनः आत्मने राज्यं स्पृहयाञ्चकार = दुर्योधन ने अपने लिए राज्य चाहा।
परिक्षीणः कश्चित् स्पृहयति यवानां प्रसृतये = कोई क्षीण पुरुष तो मुट्ठीभर जौ के लिए तरसता है।
स पश्चात् सम्पूर्णो गणयति धरित्रीं तृणसमाम् = परन्तु सम्पन्न होने पर वही व्यक्ति सारे संसार को तिनके के समान तुच्छ समझता है।

(धारि = ऋण लेना धातु के प्रयोग में ऋण देनेवाले की सम्प्रदान संज्ञा होती है अतः उसमें चतुर्थी विभक्ति का प्रयोग होता है।)

यज्ञदत्तः देवदत्ताय शतं धारयति = यज्ञदत्त देवदत्त से सौ रुपए ऋण लेता है।
अन्तेवासी गुरवे विद्यां धारयति = शिष्य गुरु से विद्या का ऋणी है।
पुत्रः पित्रे पालनं धारयति = पुत्र पिता से पालन-पोषण का ऋणी है।
सर्वे धात्रे सर्वं धारयति = सब धाता से सब चीजों के लिए ऋणी हैं।

(प्रति+श्रु तथा आ+श्रु धातु के साथ किसी के द्वारा मांगने पर देने की प्रतिज्ञा करने अर्थ में जिससे प्रतिज्ञा करता है उसकी सम्प्रज्ञान संज्ञा होती है तथा उसमें चतुर्थी विभक्ति का प्रयोग होता है।)

विप्राय गां प्रतिशृणोति = ब्राह्मण को गाय देने की प्रतिज्ञा करता है।
जनकः आत्मजायै चाकलेहम् आशृणोति = (बेटी के द्वारा मांगने पर) पिता बेटी को चॉकलेट देने की प्रतिज्ञा करता है।
सर्वे सर्वकाराय न्याय्यान् कारान् प्रतिशृणुयुः / आशृणुयुः = सरकार को उचित कर देने की सब प्रतिज्ञा करें / करनी चाहिए।
यमः नचिकेतसे उपनिषद्विद्यां प्रत्याशृणोत् / आशृणोत् = यम ने नचिकेता को उपनिषद विद्या देने की प्रतिज्ञा की।
श्रेष्ठी आजीवनं व्ययभारं वोढुं गुरुकुलछात्राय प्रतिश्रोष्यति / आश्रोष्यति = धनी सेठ ने गुरुकुल के छात्र का आजीवन व्ययभार वहन करने की प्रतिज्ञा ली।

(परिक्रयण = किसी को निश्चित समय के लिए वेतन पर रख लेना अर्थ में करण कारक की विकल्प से सम्प्रदान संज्ञा होने से उसमें चतुर्थी विभक्ति होती है।)

भूपतिः निर्धनम् आजीवनं धनेन धनाय वा परिक्रीणाति = जमीनदार निर्धन को जीवनभर के लिए खरीदता है।
सर्वकारः त्रीन् अभियन्तॄन् मार्गनिर्माणाय वर्षद्वयं धनेन / धनाय वा पर्यक्रीणात् = सरकार ने रास्ता बनाने के लिए तीन अभियन्ताओं को दो वर्ष के लिए वेतन पर रखा।
शतेन शताय वा परिक्रीतोऽस्ति दुष्ट मां प्रति वदति ? = नालायक, सौ रुपए से खरीदा हुआ है तू और मुझे उलटा बोलता है ?
धनाढ्यः बहुभूमिकं भवनं निर्मातुं निर्मातॄन् धनेन धनाय वा पञ्चवर्षाणि परिक्रेष्यति = धनपति बहुमंजिला भवन बनाने के लिए निर्माताओं को पांच वर्ष तक वेतन पर रखेगा।
यावद् ऋणं प्रत्यावर्त्तयेत् तावत्सः तं धनेन धनाय वा परिक्रीणीयात् = जब तक ऋण लौटाएगा तब तक वह उसको वेतन देकर काम पर रख लेवे।

(श्लाघ्, ह्नुङ्, स्था तथा शप् इन धातुओं के प्रयोग में जिसे ये क्रियाएं जताना अभिप्रेत है, उसकी सम्प्रदान संज्ञा होती है तथा उसमें चतुर्थी विभक्ति का प्रयोग होता है।)

मित्राय श्लाघते = मित्र की प्रशंसा करता है। (अर्थात् मित्र की दिखावटी प्रशंसा करता है)
चाटुपटुः यशसेऽधिकारिणेऽश्लाघत = चापलूस व्यक्ति ने यश के लिए अधिकारी की प्रशंसा की है।
दोषी विद्यार्थी दण्डात् मुक्तये गुरवे श्लाघिष्यते = दोषी विद्यार्थी दण्ड से बचने के लिए गुरु की प्रशंसा करेगा।
आत्मश्लाघिने तुष्टये सदा श्लाघेत = आत्मश्लाघी (खुद ही खुद का प्रशंसक) की तुष्टि के लिए सदा उसकी प्रशंसा करे।
शिशवे क्रीडनकं ह्नुते = बच्चे से खिलौना छिपाता है। (खिलौना लेने बच्चा उसके पास आए इस लिए जानबूझ कर छिपाने का दिखावा करता है)
अपलापिने तस्य वास्तुकं अपह्नुते = झूठे से उसकी किसी वस्तु को झुठलाता है। (जिससे उस झूठे व्यक्ति को पता चले कि वह भी अन्यों की वस्तुएं झुठलाता है)
रुष्टा पत्नी पत्ये तिष्ठते = रूठी हुई पत्नी पति के लिए रुकती / ठहरती है। (इस प्रकार रुकती है कि उस का रुकना पति को पता चले)
हस्तशाकटिकः क्रेतृभ्यः अतिष्ठत = ठेलेवाला खरीददारों के लिए रुका।
श्वश्रू वध्वे शपते = सास बहू की निन्दा कर रही है। (बहु को पता चले इस तरह से करती है)
क्रेता विक्रेत्रे अशपत = ग्राहक ने बेचनेवाले की निन्दा की। (यद्यपि निन्दा अन्यों के सामने की पर इस तरह से की कि बेचनेवाले को पता चले)

(राध् और ईक्ष धातुओं के प्रयोग में जिसका क्षेमकुशल जानने के लिए प्रश्न पूछे जाते हैं उसकी सम्प्रदान संज्ञा होती है अतः उसमें चतुर्थी विभक्ति का प्रयोग होता है।)

पिता वैद्यं पुत्राय राध्यति = पिता वैद्य को पुत्र के विषय में पूछता है।
पितरावपत्येभ्यः शिक्षकान् राध्येताम् = माता-पिता को बच्चों के विषय में अध्यापकों से पूछना चाहिए।
माता दूरवाण्यां विदेशस्थाय पुत्राय ईक्षते = दूरभाष पर माता विदेश में रहनेवाले बेटे को विविध प्रश्न पूछती है।
रामः हनुमन्तं सीताऐ ऐक्षत = राम ने हनुमान से सीता के विषय में पूछा।

(अप+राध् धातु के साथ जिसके प्रति अपराध किया जाता है उसमें चतुर्थी का प्रयोग देखा जाता है।)

न दूये सात्वतीसूनुर्यन्मह्यमपराध्यति।
यत्तु दन्दह्यते लोकमदो दुःखाकरोति माम्।।
श्रीकृष्ण कहते हैं- मुझे इस बात का दुःख नहीं है कि शिशुपाल मेरे प्रति अपराध कर रहा है, किन्तु उसके कारण प्रजा का जो उत्पीड़न हो रहा है यही बात मुझे परेशान कर रही है।
आत्मघाती आत्मनेऽपराध्यति = आत्महत्यारा स्वयं के प्रति अपराध करता है।
यदि गुरवेऽपराधिष्यति तर्हि ब्रह्महा भविष्यति = यदि गुरु के प्रति अपराध करेगा तो ब्रह्म का हत्यारा माना जाएगा।

(गत्यर्थक धातु के साथ चेष्टा युक्त गमन जिसमें हाथ-पैर में चेष्टा दृष्टिगोचर हो रही हो, उस में जहां जाया जाता है उसमें चतुर्थी और द्वितीया का विकल्प से प्रयोग होता है।)

बालकाः प्रातः विद्यालयाय विद्यालयं वा गच्छन्ति = बालक सुबह विद्यालय जाते हैं।
सर्वे प्रातः भ्रमणार्थं वाटिकायै वाटिकां वा गच्छेयुः = सभी को सुबह भ्रमण के लिए बगीचे में जाना चाहिए।
कृषिवलाः प्रतिदिनं ऋषभैः सह केदाराय केदारं वा गमिष्यन्ति = किसान प्रतिदिन बैलों के साथ खेत में जाएंगे।
धेनवः चरित्वा गोष्ठाय गोष्ठं वा व्रजन्ति = गाएं चर चर के बाड़े में जाती हैं।
विट् विमानेन व्यापारार्थं विदेशाय विदेशं याति = बनिया व्यापार के लिए विमान से विदेश जाता है।

(नमः, स्वस्ति, स्वाहा, स्वधा, वषट्, अलम् इन शब्दों के साथ चतुर्थी विभक्ति का प्रयोग होता है।)

नमः शम्भवाय च मयोभवाय च नमः शङ्कराय च मयस्कराय च नमः शिवाय च शिवतराय च = जिसने संसार में सुख उत्पन्न किया है और जो सांसारिक सकल सुखों का दाता है ऐसे ईश्वर को नमस्कार, कल्याण करने का ही जिसका स्वभाव है तथा स्वभक्तों को कल्याणकारी कर्मों में प्रेरित करता है जो उस ईश्वर को नमन है, अत्यन्त मंगलस्वरूप तथा मोक्ष आनन्द प्रदाता ईश्वर के लिए नमस्कार है।
स्वस्ति प्रजाभ्यः = प्रजा का कल्याण होवे।
स्वस्ति नः पथ्यासु धन्वसु स्वस्त्यप्सु वृजने स्वर्वति = पथ युक्त उत्तम प्रदेशों में (नगर, ग्राम में), मरुस्थल में, जलमय प्रदेशों में, आकाश (अन्तरिक्ष) में, द्युलोक में अर्थात् सर्वत्र हमारा कल्याण हो।
स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु = जिसका यश बढ़ा हुआ है ऐसे क्षत्रिय हमारे कल्याण को धारण करे, सब धनों का स्वामी वैश्य हमारे लिए कल्याण को धारण करे, अहिंसित तीव्रगतिवाला शूद्र हमारे लिए कल्याण को धारण करे। बृहत (विस्तृत) ज्ञान का पालक ब्राह्मण हमारे लिए कल्याण को धारण करे। अर्थात् चारों वर्ण हमारे लिए कल्याणकारी होवें।
अग्नये स्वाहा = अग्निस्वरूप परमात्मा के लिए यह आहुति है।
सोमाय स्वाहा = सुख स्वरूप परमात्मा के लिए यह आहुति है।
प्रजापतये स्वाहा = प्रजापालक परमात्माके लिए यह आहुति है।
इन्द्राय स्वाहा = परमैश्वर्यशाली परमात्मा के लिए यह आहुति है।
पितृभ्यः स्वाहा = पिरों के लिए स्वधा / अन्नादि भोग्य पदार्थ हैं।
अग्नये वषट् = अग्निस्वरूप परमात्मा के लिए आहुति है।

(विशेष = श्रौतयागों में ‘वषट्’ कहकर देवताओं को आहुति दी जाती है और स्मार्त्तयज्ञों में ‘स्वाहा’ कहकर।)

अलं मल्लो मल्लाय = पहलवाल पहलवान के लिए पर्याप्त है।
अलं सुपुत्री यशोवर्धनाय = सुसंकृत बेटी यश बढ़ाने के लिए पर्याप्त है।
दैत्येभ्यः विष्णुः समर्थः = दैत्यों को पराजित करने के लिए अकेला विष्णु ही पर्याप्त है।
विधर्मिभ्यः कः प्रभवति अद्यत्वे ? = आजकल विधर्मियों को पराजित करने में कौन समर्थ है ?

(नमः + कृ तथा नमन अर्थवाली धातुओं के साथ द्वितीया विभक्ति का प्रयोग होता है किन्तु ”प्र + नि + पत्“ तथा ‘प्र + नम्’ इन धातुओकं के साथ द्वितीया व चतुर्थी विकल्प से प्रयोग होता है।)

देवं नमस्करोति = देव को नमन करता है।
पितरम् अनमत् = पिता को नमस्कार किया।
पितरं नत्वा मातरमधुना नमामि = पिता को नमस्कार करके अब माता को नमन कर रहा हूं।
गुरुं गुरवे वा प्रणिपत्य गुरुपत्नीमपि प्रणमतु = गुरु को नमस्कार करके गुरुपत्नी को भी नमस्कार करना।
भ्रात्रे मम प्रणामं व्याहरतु = भाई को मेरा प्रणाम कहना।
अद्य आत्मदर्शी मह्यं प्रण्यपतत् = आज आत्मदर्शी ने मुझे प्रणाम किया।

(समर्थ होना, उत्पन्न करना आदि अर्थवाली क्लृप्, भू, जन आदि धातुओं के प्रयोग में उत्पद्यमान वस्तु के वाचक शब्द में चतुर्थी विभक्ति का प्रयोग होता है।)

ज्ञानं सुखाय कल्पते = ज्ञान सुख के लिए होता है।
विद्या विवादाय धनं मदाय शक्तिः परेषां परिपीडनाय।
खलस्य साधोर्विपरीतमेतद् ज्ञानाय दानाय च रक्षणाय = दुष्ट व्यक्ति की विद्या विवाद के लिए, धन अभिमान करने के लिए तथा शक्ति दूसरों को पीड़ित करने के लिए होती है। किन्तु सज्जनों की विद्या ज्ञान के लिए, धन दान के लिए तथा शक्ति दूसरों की रक्षा के लिए होती है।
वाग्देवी सुभाषिता कल्याणाय कल्पते सैव दुर्भाषिता अनर्थाय भवति = भलीभांति उच्चारित वाणी कल्याण करती है और वही जब कटु होती है तो अनर्थ पैदा करती है।
बिम्बं मतिमान्द्याय जायते = कुन्दरु बुद्धिमान्द्य लाता है

(यदि वाक्य से अनादर जाना जा रहा हो तो मन् धातु के उपमानभूत कर्म कारक में चतुर्थी व द्वितीया दोनों का प्रयोग होता है।)

अहं त्वां तृणं तृणाय वा अपि न मन्ये = मैं तुझे तिनका भी नहीं समझता हूं।
सः मां मह्यं वा बुसं मन्यते = वह मुझे भूसा समझता है।
आत्मानं किं मन्यसे त्वम् ? = तू अपने आप को क्या समझता है ?
जनाः तुभ्यं कुक्कुरमपि न मन्यन्ते = लोग तुझे कुत्ता भी नहीं समझते। (अर्थात् तुझसे तो कुत्ता भी बेहतर है।)
मम कन्यां वाञ्छति ? धिक् त्वम् ! तव धनमहं धुलिं मन्ये = मेरी लड़की को चाहता है ? धिक्कार है तुझे ! तेरे धन को मैं धूल के समान मानता हूं।
मम पादस्य पांसुभ्योऽपि त्वं न मन्ये = अपने पैर की धूली के बराबर भी तुझे नहीं मानता हूं।

आचार्या शीतल जी आर्ष गुरुकुल अलियाबाद
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इति

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