पाठ : (३९) कृदन्त (६) ल्यप् प्रत्यय ||


 (सोपसर्ग = उपसर्ग सहित धातु हो तो क्त्वा प्रत्यय के स्थान पर ल्यप् प्रत्यय का प्रयोग होता है। ल्यप् प्रत्ययान्त क्रिया शब्द भी अव्यय होता है, अतः इसके विभिन्न विभक्तियों में रूप नहीं चलते।)

छात्राः गुरुकुले प्रातरुत्थाय ईश्वरं ध्यायन्ति = छात्राएं गुरुकुल में सुबह उठकर ईश्वर का ध्यान करती हैं।
पुरा पितामही कूपात् जलमानीय स्नाति स्म = पहले दादीमां कुंए से पानी लाकर स्नान करती थीं।
धनयन्त्रात् रुप्यकाणि निसार्य आपणं गता = एटीएम से पैसे निकालकर दुकान पर गई।
सम्भूय सर्वे बालाः क्रीडन्ति = मिलकर के सभी बच्चे खेल रहे हैं।
चटका धान्यकणान् चञ्च्वा आदाय चाटकैरं भोजयति = चिड़िया चोंच से दाने लाकर बच्चे को खिला रही है।
पथिभ्रष्टो हिरणः ग्रामस्य प्राकारं प्रकूर्द्य वनं प्राविशत् = मार्ग भटका हुआ हिरण गांव की चारदिवारी कूदकर वनमें चला गया।
पक्षिणः प्रातः वृक्षात् उड्डीय अस्तं पुनरागच्छन्ति = पक्षी पेड़ पर से सुबह उड़कर शाम को फिर लौट आ जाते हैं।
गुणिनोऽविगणय्य स्वकष्टान् उपकुर्वन्ति = सज्जन अपने कष्टों की परवाह किए बिना उपकार में लगे रहते हैं।
गोभक्तः विक्रीय महिषीं गामक्रैषीत् = गोभक्त ने भैंस बेचकर गाय खरीदी।
सर्वाणि शास्त्राणि समीक्ष्य जिज्ञासुरन्ते वैदिकधर्मम् अङ्गीचकार = समस्त शास्त्रों की समीक्षा करके अन्त में जिज्ञासु ने वैदिक धर्म को स्वीकार किया।
पितुराज्ञां विधाय ज्येष्ठभ्राता विद्यालयात् व्यापारे समलगत् = पिता की बात रखते हुए बड़ा भाई विद्यालय न जाकर व्यापार में लग गया।
उपदिश्य मूर्खान् स्वमौर्ख्यं मा प्रकटीकुर्यात् = मूर्खों को उपदेश देकर अपनी मूर्खता जाहिर न करनी चाहिए।
धर्मम् आश्रित्य यो जीवति सः सुखी भवति = धर्म का आश्रय लेकर जो जीता है, वह सुखी होता है।
सन्त्यज्य सन्त्यज्य दोषान् पुनरुपाददानोऽबुधः श्ववृत्तमेवाऽवर्त्तयति = जैसे कुत्ता अपना वमन किया हुआ स्वयं चाट लेता है, वैसे ही अज्ञानी व्यक्ति अपने दोषों को बार-बार छोड़कर पुनः उन्हें करने लग जाता है।
अभिवन्द्य गुरुं पाठं पठेत् = गुरु को अभिवादन करके पाठ पढ़ना चाहिए।
आहूय रामं कैकेयी वरद्वयम् अश्रावीत् = राम को बुलाकर कैकेयी ने अपने दो वरदान सुनाए।
कैकेय्याः अभिप्रायं विज्ञाय रामोऽयोध्यां परित्यज्य वनमारोहत् = कैकेयी के अभिप्राय को जानकर राम अयोध्या छोड़कर वन में चला गया।
रामे वनं गते दशरथो बहु विलप्य मृतः = राम के वन चले जाने से दशरथ बहुत विलाप करके मर गया।
भरतोऽपि कैकेयीं संक्रुध्य राममानेतुं वनाय विसर्जितः = भरत भी कैकेयी पर खूब गुस्सा करके राम को लाने के लिए वन चला गया।
विदुषो विहस्य मूर्ख आत्मानं पण्डितं मन्यते = विद्वानों का उपहास करके मूर्ख अपने आप को पण्डित मानता है।
आश्लिष्य रामं भरतो भृशं संतताप = राम का आलिंगन करके भरत खूब दुःखी हुआ।
रामस्य वार्तां निशम्य क्रुद्धो लक्ष्मणोऽशमत् = राम की बात सुनकर क्रोधित लक्ष्मण शान्त हो गया।
हेमहरिणं संदृश्य सीता अमोहीत् = सोने का हिरण देखकर सीता मोहित हो गई।
उल्लन्घ्य लक्ष्मणस्य वचः सीता भिक्षुकाय भिक्षामददात् = लक्ष्मण की बात का उल्लंघन करके सीता ने भिक्षुक को भिक्षा दी।
छद्मवेषो रावणः सीताम् अपहृत्य लंकामानिनाय = छद्मवेषधारी रावण सीता का अपहरण करके लंका ले आया।
वाग्मी हनुमान् सीताम् अन्विष्य रामं सूचयाञ्चकार = वाक्पटु हनुमान ने सीता की खोज करके राम को सूचना दी।
रावणं निहत्य रामः सीतां पुनः प्राप = रावण को मार को राम ने सीता को फिर से पा लिया।
अयोध्यामागत्य सर्वे सुखसुखेन जीवनं यापयाञ्चक्रुः = अयोध्या आकर सबने अत्यन्त सुख से जीवन बिताया।

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोपराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देहि।। = जैसे मनुष्य फटे हुए वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नए वस्त्र धारण कर लेता है, वैसे ही यह जीवात्मा जीर्ण शरीरों को त्यागकर दूसरे नवीन शरीर प्राप्त कर लेता है।

सञ्चिन्त्य मनसा राजन् विदित्वा शक्यमात्मनः।
करोति यः शुभं कर्म स वै भद्राणि पश्यति।। = हे राजन् ! जो मनुष्य मन से भली प्रकार चिन्तन करके और अपने सामर्थ्य को देखकर शुभ कर्म करता है, वह भद्र का दर्शन करता है, अर्थात् उसके जीवन में शुभ ही शुभ होता है।

धर्मं प्रसङ्गादपि नाचरन्ति पापं प्रयत्नेन समाचरन्ति।
आश्चर्यमेतद्धि मनुष्यलोकेऽमृतं परित्यज्य विषं पिबन्ति।। = लोग धर्म का तो किसी प्रसंग के बहाने से भी आचरण नहीं करते, और पाप का तो प्रयत्नपूर्वक आचरण करते हैं। मानव संसार में यह एक अद्भुत बात है कि लोग अमृत को त्याग कर विष को पीते हैं।

इन्द्रियाणां प्रसङ्गेन दोषमृच्छत्यसंशयम्।
सन्नियम्य तु तान्येव ततः सिद्धिं नियच्छति।। = मनुष्य इन्द्रियों की आसक्ति से निश्चय ही दोष को प्राप्त होता है। और इन्हीं इन्द्रियों को नियन्त्रित करके सिद्धि को प्राप्त होता है।

समुत्पत्तिं च मांसस्य वधबन्धौ च देहिनाम्।
प्रसमीक्ष्य निवर्त्तेत सर्वमांसस्य भक्षणात्।। = मांस की प्राप्ति का और प्राणियों के बन्धन तथा हत्यादि का विचार करके मनुष्य को सब प्रकार के मांस के सेवन से दूर हो जाना चाहिए।

उपनीय तु यः शिष्यं वेदमध्यापयेद् द्विजः।
सकल्पं सरहस्यं च तमाचार्यं प्रचक्षते।। = जो विद्यावान् मनुष्य शिष्य का उपनयन करके उसे कल्प (= श्रौत, गृह्य, धर्म तथा शुल्ब सूत्र) सहित और उपनिषद सहित सम्पूर्ण वेद पढ़ावे, उसे ही आचार्य कहते हैं।

निश्चित्य यः प्रक्रमते नान्तर्वसति कर्मणः।
अवन्ध्यकालो वश्यात्मा स वै पण्डित उच्यते।। = जो पहले निश्चय करके फिर कर्म का आरम्भ करता है, कर्म के बीच में नहीं ठहरता, समय को व्यर्थ नहीं गंवाता और जो अपने आप को वश में रखता है वही पण्डित कहाता है।

यथा वायुं समाश्रित्य वर्त्तन्ते सर्वजन्तवः।
तथा गृहस्थमाश्रित्य वर्त्तन्ते सर्वआश्रमाः।। = जैसे वायु के सहारे सभी प्राणी जीवित रहते हैं, वैसे ही गृहस्थ के सहारे सभी अन्य आश्रमी स्व-कर्म में स्थिर रहते हैं।

अतिथिर्यस्य भग्नाशो गृहात्प्रति निवर्त्तते।
स दत्त्वा दुष्कृतं तस्मै पुण्यमादाय गच्छति।। = जिस गृहस्थ के घर से आया हुआ अतिथि बिना भोजनादि की आशा पूरी किए खाली लौट जाता है, वह अतिथि उस गृहस्थ को अपने दुष्कर्म देकर और उस गृहस्थ के सत्कर्म लेकर चला जाता है।

न सङ्करेण द्रविणं प्रचिन्वीयाद् विचक्षणः।
धर्मार्थं न्यायमुत्सृज्य न तत् कल्याणमुच्यते।। = बुद्धिमान् मनुष्य धर्मयुक्त न्याय को त्यागकर जिस किसी प्रकार से धन का संग्रह न करे। ऐसा धन कल्याणकारक नहीं होता।

सन्त्यज्य ग्राम्यमाहारं सर्वं चैव परिच्छदम्।
पुत्रेषु भार्यां निक्षिप्य वनं गच्छेत् सहैव वा।। = ग्राम में सुलभ भोजन को और सब प्रकार की सुख सामग्री को त्यागकर तथा पत्नी को अपने पुत्रों को सौप कर वानप्रस्थी वन में जावे अथवा (पत्नी भी तपस्या के इच्छुक हो तो) पत्नी के साथ ही वन को प्रस्थान करे।

अग्निहोत्रं समादाय गृह्यं चाग्निपरिच्छदम्।
ग्रामादरण्यं निःसृत्य निवसेन्नियतेन्द्रियः।। = अग्निहोत्र करने के व्रत को तथा गृहस्थित अग्निहोत्र करने के उपकरणों को साथ लेकर, गांव से निकलकर वन में जितेन्द्रिय होकर वानप्रस्थी निवास करे।

अधीत्य विधिवद् वेदान् पुत्रांश्चोत्पाद्य धर्मतः।
इष्ट्वा च शक्तितो यज्ञैर्मनो मोक्षे निवेशयेत्।। = विधिवत् वेदों को पढ़कर, धर्मानुसार सन्तानों को जन्म देकर तथा उनका पालनपोषण करके, सामर्थ्यानुसार अनेक प्रकार के यज्ञ = परोपकार करके तत्पश्चात् अपने मन को मोक्ष में लगावे।

योऽनधीत्य द्विजो वेदमन्यत्र कुरुते श्रमम्।
स जीवन्नेव शूद्रत्वमाशु गच्छति सान्वयः।। = जो द्विज वेद का अध्ययन न करके अन्य ग्रन्थों के पढ़ने में अथवा अन्य कर्मों को करने में परिश्रम करता है, वह जीते जी ही अपने वंश सहित शीघ्र शूद्रत्व को प्राप्त हो जाता है।

मत्या परीक्ष्य मेधावी बुद्ध्या सम्पाद्य चासकृत्।
श्रुत्वा दृष्ट्वाऽथ विज्ञाय प्राज्ञैर्मैत्रीं समाचरेत्।। = बुद्धिमान् मनुष्य मनन, चिन्तन द्वारा परीक्षा करके, बुद्धि से अनेक बार निश्चय करके, सुनकर, देखकर और समझकरके मेधावी लोगों के साथ मित्रता करे।

यथा काष्ठं च काष्ठं च समेयातां महार्णवे।
समेत्य च व्यपेयातां कालमासाद्य कञ्चन।।
एवं भार्या च पुत्राश्च ज्ञातयश्च वसूनि च।
समेत्य व्यवधावन्ति ध्रुवो येषां विनाभवः।। = जैसे महासागर में दो काष्ठ इकट्ठे हो जाएं, ऐसे ही पत्नी, पुत्र, बन्धु-बान्धव और धन-सम्पत्ति ये सब हमारे साथ इकट्ठे होकर फिर हमसे दूर हो जाते हैं, क्योंकि इन सबका दूर होना अवश्य ही निश्चित होता है।

सन्तोषं परमास्थाय सुखार्थी संयतो भवेत्।
सन्तोषमूलं हि सुखं दुःखमूलं विपर्ययः।। = सुख इच्छुक मनुष्य सन्तोष को उत्तमता से धारण करके संयम वर्त्ते, क्योंकि सन्तोष ही सुख का मूल है और असन्तोष (तृष्णा) दुःख का कारण है।

सन्त्यज्य हृद्गुहेशानं देवमन्यं प्रयान्ति ये।
ते रत्नमभिवाञ्छन्ति त्यक्त्वा हस्तस्थ कौस्तुभम्।। = जो लोग हृदयरूपी गुहा में विद्यमान परमेश्वर को छोड़कर दूसरे देवता को ढूंढते फिरते हैं, वे मानो मुट्ठी में पकड़ी हुई मणि को छोड़कर कांच के टुकड़े को इधर-उधर ढूंढते फिरते हैं।

मृतं शरीर मृत्सज्य काष्ठलोष्ठसमं क्षितौ।
विमुखा बान्धवा यान्ति धर्मस्तमनुगच्छति।। = बन्धु-बान्धव निर्जीव शरीर को लकड़ी और मिट्टी के ढेले के समान भूमि पर छोड़कर परांगमुख होकर चले जाते हैं, एक धर्म ही उसके साथ जाता है।

इन्द्रियाणि च संयम्य बकवत् पण्डितो नरः।
देशकालबलं ज्ञात्वा सर्वकार्याणि साधयेत्।। = बुद्धिमान मनुष्य को चाहिए कि अपने इन्द्रियों को वश में और चित्त को एकाग्र करके तथा देश, काल और अपने बल को जानकर बगुले के समान धैर्यपूर्वक अपने सारे कार्यों को सिद्ध करे।

प्रत्युत्थानं च युद्धं च संविभागं च बन्धुषु।
स्वयमाक्रम्य भुक्तं च शिक्षेच्चत्वारि कुक्कुटात्।। = यथासमय (सूर्यादय से पूर्व) जागना, युद्ध के लिए उद्यत रहना, बन्धुओं को उनका हिस्सा देना और आक्रमण करके भोजन करना इन चार बातों को मुर्गे से सीखना चाहिए।

न वेत्ति यो यस्य गुणप्रकर्षं स तं सदा निन्दति नाऽत्र चित्रम्।
यथा किराती करिकुम्भजाता मुक्ताः परित्यज्य बिभर्त्ति गुञ्जाः।। = जो जिसके गुणों की श्रेष्ठता को नहीं जानता, वह सदा उसकी निन्दा करता है यह तनिक भी आश्चर्य की बात नहीं है। देखो न ! भीलनी हाथी के मस्तक से उत्पन्न होनेवाले मोतियों को छोड़कर घुंघची की माला को धारण करती है।

हस्तं हस्तेन संपीड्य दन्तैर्दन्तान् विचूर्ण्य च।
अङ्गान्यङ्गैः समाक्रम्य जयेदादौ स्वकं मनः।। = हाथ को हाथ से भींचकर, दातों को दातों से पीसकर, अंगों को अंगों से आक्रान्त करके अर्थात् प्रबल पुरुषार्थ से सर्वप्रथम मन को जीतना चाहिए।

स्नेहेन तिलवत्सर्वं सर्गचक्रे निपीड्यते।
तिलपीडैरिवाक्रम्य क्लेशैरज्ञानसम्भवैः।। = तेली लोग तेल के लिए जैसे तिल को कोल्हू में पेलते हैं उसी प्रकार स्नेह के कारण सब लोग अज्ञानजनित क्लेशों द्वारा सृष्टि-चक्र में पिस रहे हैं।

विहाय कामान्यः सर्वान्पुमाँश्चरति निःस्पृहः।
निर्ममो निरहंकारः स शान्तिमधिगच्छति।। = जो पुरुष सब कामनाओं को त्याग देता है तथा लालसा व ममता से रहित होकर मैं-मेरे की भावना को छोड़कर विचरता है, वह शान्ति को प्राप्त करता है।

अभिसन्धाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत्।
इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम्।। = हे भरतकुल में श्रेष्ठ अर्जुन ! जो यज्ञ = परोपकार किसी फल को लक्ष्य में रखकर अथवा अपने वैभव-ऐश्वर्य प्रदर्शित करने के लिए किया जाता है, उसे राजसिक यज्ञ जान।

यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः।
दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम्।। = जो दान किसी उपकार के बदले में प्रत्युपकार रूप किया जाता है अथवा भविष्य में किसी लाभ की आशा से दिया जाता है, अथवा जिस दान को करते हुए दानदाता क्लेश-दुःख का अनुभव करता है, उसे राजसिक दान माना जाता है।

अनुबन्धं क्षयं हिंस्यमनवेक्ष्य च पौरुषम्।
मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते।। = जो कर्म क्या परिणाम होगा, क्या हानि हो जाएगी, किस-किस की हिंसा होगी, अपना सामर्थ्य उस काम को करने का है या नहीं, इन सब बातों पर विचार किए बिना मूर्खता से किया जाता है, वह तामस कर्म कहाता है।

यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्।
स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दन्ति मानवः।। = जिससे सब प्राणि जन्म लेते हैं, जिससे यह समस्त संसार फैला हुआ है, उस परमात्मा की अपने कर्मों से पूजा करके मनुष्य सिद्धि को प्राप्त कर लेता है।

बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्याऽऽत्मानं नियम्य च।
शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च।। = विशुद्ध बुद्धि से युक्त होकर, अपने आप को धैर्यपूर्वक संयम में रखकर, शब्द आदि इन्द्रियों के विषयों का त्यागकर, राग और द्वेष को नष्ट करके (व्यक्ति ज्ञान की पराकाष्ठा को प्राप्त कर लेता है)।

अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम्।
विमुच्य निर्मर्मः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते।। = अहंकार, बल, अभिमान, काम, क्रोध और धन-सम्पत्ति को छोड़कर ममता से (मै-मेरे की भावना से) रहित होकर जो मन को नियन्त्रित कर लेता है, वह ब्रह्म प्राप्त करने के योग्य हो जाता है।

चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः।
बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चितः सततं भव।। = अपने चित्त से सब कर्मों को मुझे समर्पित करके मुझे ही अपना लक्ष्य समझता हुआ, समाधि का आश्रय लेकर अपने चित्त को निरन्तर मुझमें लगाए रख।

सत्त्वं सुखे संजयति रजः कर्मणि भारत।
ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे सञ्जयत्युत।। = हे भारत ! (अर्जुन) सत्त्वगुण मनुष्य को सुख में, रजोगुण कर्म में और तमोगुण ज्ञान को ढककर प्रमाद में लगा देता है।

श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च।
अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते।। = आत्मा कान, आंख, त्वचा, जीभ, नाक और मन का आश्रय लेकर विषयों का सेवन करता है।

उत्क्षिप्य टिट्टिभः पादावास्ते भङ्गभयाद्दिवः।
स्वचित्तकल्पितो गर्वः कस्य नात्रापि विद्यते।। = आकाश कहीं हमारे ऊपर टूटकर न गिर पड़े इस भय से टिड्डा अपने पैरों को आकाश की ओर ऊपर उठाकर सोता है। भला इस संसार में किसे अपने चित्त से कल्पना किया हुआ अभिमान नहीं होता ?

महान्तमप्यर्थमधर्मयुक्तं यः संत्यजत्यनपाकृष्ट एव।
सुखं सुदुःखान्यवमुच्य शेते जीर्णां त्वचं सर्प इवावमुच्य।। = जो पुरुष अधर्मयुक्त महान धनराशि को उसकी ओर आकृष्ट न होता हुआ छोड़ देता है, वह जैसे सर्प जीर्ण त्वचा (कैंचुली) को त्यागकर सुखी होता है, उसी प्रकार भारी दुःखों से छूटकर सुख को प्राप्त होता है।

उत्सृज्य विनिवर्तन्ते ज्ञातयः सुहृदः सुताः।
अपुष्पानफलान् वृक्षान् यथा तात पतत्रिणः।। = हे तात ! सम्बन्धी, माता, पिता, मित्र, पुत्रादि सभी (मृत पुरुष को जंगल/स्मशान में) छोड़कर उसी प्रकार वापस आ जाते हैं, जैसे पुष्प और फल से रहित वृक्ष को पक्षी छोड़ जाते हैं।

अधीत्य वेदान् परिसंस्तीर्य चाग्नीनिष्ट्वा यज्ञैः पालयित्वा प्रजाश्च।
गोब्राह्मणार्थं शस्त्रपूतान्तरात्मा हतः संग्रामे क्षत्रियः स्वर्गमेति।। = जो क्षत्रिय वेदों को पढ़कर, अग्नि (=वेदी) को कुशा से आच्छादित कर (पवित्र कर), यज्ञ करके, प्रजा का पालन करके, शस्त्र (के आघात = प्रहारों) से पवित्र आत्मावाला संग्राम में मारा गया, स्वर्ग = कल्याण को प्राप्त करता है।

वैश्योऽधीत्य ब्राह्मणान् क्षत्रियांश्च धनैः काले संविभज्याश्रितांश्च।
त्रेतापूतं धूममाघ्राय पुण्यं प्रेत्य स्वर्गे दिव्यसुखानि भुङ्क्ते।। = जो वैश्य वेदों को यथाविधि पढ़कर समयानुसार ब्राह्मण, क्षत्रिय, और अपने आश्रित्य भृत्यवर्ग को धन बांटकर, तीन अग्नियों से (माता-पिता-आचार्य) उठे हुए पवित्र धूम को सूंघकर (से प्राप्त शिक्षा से शिक्षित होकर) मरता है, वह मृत्यु के बाद स्वर्ग लोक में उत्तम सुखों को भोगता है।



संस्कृतं वद आधुनिको भव।
वेदान् पठ वैज्ञानिको भव।।


इति

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