पाठ: (34) कृदन्त 1 (निष्ठा प्रत्यय)


(व्याकरण में क्त तथा क्तवतु प्रत्यय की निष्ठा संज्ञा है। सामान्य रूप से दोनों प्रत्ययों का प्रयोग भूतकाल दर्शाने के लिए होता है। क्तवतु प्रत्यय कर्तरि वाच्य में तथा क्त प्रत्यय कर्म व कतृवाच्य में प्रयुक्त होता है। दोनों प्रत्ययों से निर्मित कृदन्त शब्द स्वतन्त्र क्रिया के रूप में भी प्रयुक्त होते हैं, तथा विशेषण रूप में भी यथा:- 

क्रियारूप में प्रयोग = रामः गतवान्/गतः = राम गया।
विशेषणरूप में प्रयोग = गतवन्तं/गतं रामं शोचति = गए हुए राम का शोक करता है।

कर्मवाच्य में क्त प्रत्यय =
यदि क्त प्रत्ययान्त शब्द क्रिया के रूप में प्रयुक्त है, तब कर्त्ता में तृतीया, कर्म में प्रथमा तथा क्तान्त क्रिया शब्द के लिङ्ग-वचन-विभक्ति कर्म के अनुसार होंगे, और यदि क्तान्त शब्द के विशेषण होने पर उसके लिङ्ग-वचन-विभक्ति विशेष्य के अनुसार होंगे।)

(क्त प्रत्यय कर्मवाच्य में क्रियारूप प्रयोग)

अहं पाठं लिखामि = मैं पाठ लिख रहा/रही हूं।
मया पाठः लिखितः = मेरे द्वारा पाठ लिखा गया।

रामः रोटिकां खादति = राम रोटी खा रहा है।
रामेण रोटिका खादिता = राम के द्वारा रोटी खाई गई।

चित्रकारः चित्रं करोति = चित्रकार चित्र बना रहा है।
चित्रकारेण चित्रं कृतम् = चित्रकार के द्वारा चित्र बनाया गया।

अहं पाठौ लिखामि = मैं दो पाठ लिख रहा/रही हूं।
मया पाठौ लिखितौ = मेरे द्वारा दो पाठ लिखे गए।
अहं पाठान् लिखामि = मैं पाठों को लिख रहा/रही हूं।
मया पाठाः लिखिताः = मेरे द्वारा पाठ लिखे गए।

रामौ रोटिकां खादतः = दो राम रोटी खा रहे हैं।
रामाभ्यां रोटिका खादिता = दो राम के द्वारा रोटी खाई गई।
रामाः रोटिकां खादन्ति = बहुत सारे राम रोटी खा रहे हैं |
रामैः रोटिका खादिता = बहुत सारे राम के द्वारा रोटी खायी गयी |

चित्रकारौ चित्रे कुरुतः = दो चित्रकार दो चित्र बना रहे हैं।
चित्रकाराभ्यां चित्रे कृते = दो चित्रकारों के द्वारा दो चित्र बनाए गए।
चित्रकाराः चित्राणि कुर्वन्ति = बहुत सारे चित्रकार चित्रों को बना रहे हैं।
चित्रकारैः चित्राणि कृतानि = अनेक चित्रकारों के द्वारा चित्रों को बनाया गया।

बालेन बुग्धं पीतम् = बच्चे के द्वारा दूध पीया गया।
मात्रा शाकं संस्कृतम् =  मां ने सब्जी छोंकी।
जनैः रावणः दग्धः = लोगों ने रावण को जलाया।
हस्तशाकटिकेन जलापूपाः विक्रीताः = ठेलेवाले ने पानीपूरी बेची।
भगिन्या भिक्षुकाय भोजनं दत्तम् = बहन ने भिक्षुक को भोजन दिया।
सेवकेन शौचार्थं भ्रमणार्थञ्च कुक्कुरः बहिर्नीतः = सेवक शौच एवं भ्रमण के लिए कुत्ते को बाहर ले गया।
विक्रेत्रा शुकः पिञ्जरे बद्धः = विक्रेता (बहेलिया) ने तोते को पिंजरे में बन्द कर दिया।
बोद्धृभिः सनातन-धर्मः बुद्धः = विद्वानों ने सनातन धर्म को जाना।
कन्यया शाटिका क्रीता = लड़की ने साड़ी खरीदी।
राजनेत्रा भाषणं भाषितम् = राजनेता ने भाषण दिया।
पेष्ट्रा घरट्टेन चूर्णं पिष्टम् = पिसनवाले ने चक्की से आटा पिसा।
पथिकेन नगरात् ग्रामो गतः = पथिक नगर से गांव गया।
कृषकेन क्षेत्रे वायुना धान्यं पूतम् = किसान ने खेत में हवा से धान साफ किया।
पाचिकया तण्डुलाः शोधिताः = पाचिका (भोजन बनानेवाली) ने चावल साफ किए।
बालिकया आत्मा अलंकृतः = लड़की ने अपने आप को सजाया।
उपासनायै आसनं ततम् = उपासना के लिए आसन फैलाया।
पश्चात् आसने उपविश्य प्राणायामाः कृताः, इन्द्रियाणि प्रत्याहृतानि, ईश्वरश्च ध्यातः = इसके बाद आसन पर बैठ कर प्राणायाम किए, इन्द्रियों का प्रत्याहार सिद्ध कर ईश्वर-चिन्तन किया।

हतं ज्ञानं क्रियाहीनं हतश्चाऽज्ञानतो नरः।
हतं निर्नायकं सैन्यं स्त्रियो नष्टा ह्यभर्त्तृकाः।। = आचरण के बिना ज्ञान नष्ट हो जाता है, अज्ञान से मनुष्य नष्ट हो जाता है, सेनापति के बिना सेना नष्ट हो जाती है और पति के बिना स्त्रियां नष्ट हो जाती हैं।

तद्गृहं यत्र वसति तद् भोज्यं येन जीवति।
यन्मुक्तये तदेवोक्तं ज्ञानमज्ञानमन्यथा।। = जहां निवास होता है वहां घर है, जिससे प्राणी जीवित रहते हैं वह अन्न है, जिससे मोक्ष मिलता है वह ज्ञान है, शेष सब अज्ञान है।

निर्गुणस्य हतं रूपं दुःशीलस्य हतं कुलम्।
असिद्धस्य हता विद्या अभोगेन हतं धनम्।। = गुणहीन मनुष्य की सुन्दरता व्यर्थ है, शीलरहित का कुल नष्ट हो जाता है, आचरण में उतारे बिना विद्या नष्ट हो जाती है तथा भोग के बिना धन नष्ट हो जाता है।

अर्थाऽधीताश्च यैर्वेदास्तथा शूद्रान्नभोजिनाः।
ते द्विजाः किं करिष्यन्ति निर्विषा इव पन्नगाः।। = जिन ब्राह्मणों ने धन प्राप्ति के लिए वेदों को अध्ययन किया है तथा जो शूद्र-शराबी-कबाबी अर्थात् नीच-पतित मनुष्यों का अन्न खाते हैं, ऐसे विषहीन सर्प के समान निस्तेज वे ब्राह्मण क्या कर सकते हैं ?

धनहीनो न हीनश्च धनिकः स सुनिश्चयः।
विद्यारत्नेन यो हीनः स हीनः सर्ववस्तुषु।। = धनाभाव में जीता गरीब किन्तु विद्यावान् वस्तुतः दीन-हीन नहीं है, वह तो निश्चय ही महाधनी है। परन्तु जो मनुष्य विद्यारूपी रत्न से हीन है वही कंगाल है।

बुद्धिर्यस्य बलं तस्य निर्बुद्धेश्च कुतो बलम्।
वने सिंहो मदोन्मत्तः शशकेन निपातितः।। = जिसके पास बुद्धि है वास्तव में उसी के पास बल है, बुद्धिहीन के पास बल कहां ? देखो, वन में उन्मत्त सिंह भी बुद्धिमान खरगोश के द्वारा मारा गया।

सुखार्थाः सर्वभूतानां मताः सर्वाः प्रवृत्तयः।
सुखं च न विना धर्मात्तस्माद् धर्मपरो भवेत्।। = सभी प्राणियों की सकल प्रवृत्तियां स्वयं के सुखप्राप्ति के लिए होती हैं। सुख धर्म के बिना नहीं मिलता, अतः मनुष्य को धर्मपरायण होना चाहिए।

देहाभिमाने गलिते विज्ञाते परमात्मनि।
यत्र यत्र मनो याति तत्र तत्र समाधयः।। = देहाभिमान का नाश और परमात्मनिष्ठ हो जाने पर जहां जहां मन जाता है वहीं वहीं समाधि समझनी चाहिए।

यथा धेनु सहस्रेषु वत्सो गच्छति मातरम्।
तथा यच्च कृतं कर्म कर्त्तारमनुगच्छति।। = जैसे हजारों गायों में भी बछड़ा अपनी माता को पहचानकरउसी के पास जाता है ठीक उसी प्रकार मनुष्य जो भी कर्म करता है वह उसके पीछे-पीछे चलता है अर्थात् उसे अपने किए का फल भोगना ही पड़ता है।

बोद्धारो मत्सग्रस्ताः प्रभवः स्मयदूषिताः।
अबोधोपहताश्चान्ये जीर्णमङ्गे सुभाषितम्।। = विद्वान् एक दूसरे से डाह रखते हैं, समर्थ धनी एवं अधिकारी अभिमान के नशे में चूर हैं, साधारण लोग पहले ही अज्ञान में फंसे हुए हैं, ऐसी दुरवस्था में दिव्य उपदेश मन में ही रह जोते हैं, अर्थात् सुनाएं तो किसे सुनाएं ?

क्षीरेणात्मगतोदकाय हि गुणा दत्ताः पुरा तेऽखिलाः।
क्षीरोत्तापमवेक्ष्य तेन पयसा स्वात्मा कृशानौ हुतः।
गन्तुं पावकमुन्मनस्तदभवद् दृष्ट्वा तु मित्रापदम्।
युक्तं तेन जलेन शाम्यति सतां मैत्री पुनस्त्वीदृशी।। = अपने में मिलाए गए जलरूपी मित्र को दुध ने अपने सभी गुण देकर अपने जैसा बना लिया। उस उपकार के बदले में गरम किए जाते दूध को जलते देख पानी ने अपने को अग्नि के समर्पित कर दिया। अग्नि द्वारा स्वमित्र का नाश न देख सकनेवाला दुध जैसे ही उफनकर अग्नि को बुझाने के लिए व्याकूल हो उठा उतने में छींटों के रूप में अपने मित्र को पुनः पाकर वह शान्त हो गया। सारांश यह है सज्जनों की मित्रता ऐसी उच्चकोटि की होती है।

(क्त प्रत्यय कर्मवाच्य में विशेषणरूप प्रयोग)

बालिकया अर्धा रोटिका भुक्ता = लड़की ने आधी रोटी खाई।
सा अर्धां भुक्तां रोटिकां भ्रात्रे ददाति = वह आधी खाई हुई रोटी भाई को देती है।

ब्रह्मदर्शिना कञ्चुकं धृतम् = ब्रह्मदर्शी ने कुर्ता पहना।
ब्रह्मदर्शिना धृतं कञ्चुकम् आत्मदर्शिना क्लेदितम् = ब्रह्मदर्शी के द्वारा पहने कुर्ते को आत्मदर्शी ने गीला कर दिया।

तत्त्वदर्शिना वेदमन्त्राः स्मृताः = तत्त्वदर्शी ने वेदमन्त्र याद किए।
स्मृतैः वेदमन्त्रैः तत्त्वदर्शिना यश उपार्जितः = याद किए हुए वेदमन्त्रों द्वारा तत्त्वदर्शी ने यश प्राप्त किया।

सौचिकेन स्यूतं स्यूतम् = दर्जी ने थैला सिला।
तया स्यूते स्यूते वस्तूनि स्थापयित्वा आपणात् आनीतानि = उसके द्वारा सिले थैले में वस्तुएं रखकरदुकान से लाई गईं।

चालकेन यानं नगरं नीतम् = चालक गाड़ी को शहर ले गया।
नगरं नीतस्य यानस्य घट्टनं सञ्जातम् = शहर ले जाए गए यान से दुर्घटना हुई।

गीताञ्जलिना गां दुग्धं दुग्धम् = गीताञ्जलि ने गाय का दूध दुहा।
दुग्धेन दुग्धेन पायसं पक्वम् = दुहे हुए दूध से खीर पकाई।

पत्या दयिता दयिता = पति ने पत्नी को प्रेम किया।
दयितया दयितया पतिः प्रीतः = प्रेम प्राप्त पत्नी ने पति को प्रसन्न किया।

द्यूतकारेण द्यूतः द्यूतः = जुआरी ने जुआ खेला।
द्यूतेन द्यूतेन तस्य सर्वं धनं नष्टम् = खेले गए जुए द्वारा उसका सारा धन समाप्त हुआ।

मथन्या मथितं मथितम् = मथनी से बिलोए हुए दही को मथा।
मथितेन मथितेन ओदनं भुक्तम् = बिलोए हुए मथित से भात खाए।

रञ्जकेन रक्तेन वर्णेन वस्त्रं रक्तम् = रंगरेज ने लाल रंग से कपड़ा रंगा।
रक्तेन रक्तं वस्त्रं पुनरापणिकाय दत्तम् = लाल रंग से रंगा वस्त्र फिर दुकानवाले को दे दिया।

सामृतैः पाणिभिर्घ्नन्ति गुरवो न विषोक्षितैः।
लालनाश्रयिणो दोषाः ताडनाश्रयिणो गुणाः।। = गुरुजन अमृतमय हाथों से ताड़न करते हैं, विषयुक्त हाथों से नहीं, मिथ्या लाड़ से पाल्य दोषयुक्त होते हैं जबकि उचित ताड़न से गुणयुक्त।

नदीतीरे च ये वृक्षाःपरगेहेषु कामिनी।
मन्त्रिहीनाश्च राजानःशीघ्रं नश्यत्यसंशयम्।। = नदी के किनारे पर उगे हुए वृक्ष, दूसरे के घर जाने अथवा रहनेवाली स्त्री और मन्त्रियों रहित राजा ये सब निश्चय ही शीघ्र नष्ट हो जाते हैं।

किं कुलेन विशालेन विद्याहीनेन देहिनाम्।
दुष्कुलीनोऽपि विद्वांश्च देवैरपि सुपूज्यते।। = स्वयं विद्याहीन यदि है तो बड़े कुल से उसे क्या लाभ ? नीच कुलोत्पन्न विद्वान भी अन्य विद्वानों द्वारा सम्मानित होता पाया गया है।

अन्नहीनो दहेद् राष्ट्रं मन्त्रहीनश्च ऋत्विजः।
यजमानं दानहीनो नास्ति यज्ञसमो रिपुः।। = अन्नहीन यज्ञ राष्ट्र को, मन्त्रहीन यज्ञ ऋत्विजों को और दानरहित यज्ञ यजमान को भस्म कर देता है। संसार में यज्ञ (विधिहीन) के समान कोई शत्रु नहीं है।

विधिहीनस्य यज्ञस्य कर्त्ता सद्यः विनश्यति = विधिहीन यज्ञकर्त्ता शीघ्र नष्ट हो जाता है।

विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम्।
श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं प्रचक्षते।। = जो शास्त्रोक्त विधिरहित हो, जिसमें लोक-कल्याणार्थ अन्नदान न किया गया हो, जिसमें वेद मन्त्रों को उच्चारण न किया गया हो, जिसमें यज्ञ करानेवाले को दक्षिणा न दी गई हो और बिना श्रद्धा से किया गया हो, ऐसे यज्ञ को तामस यज्ञ कहते हैं।

रोहते सायकैर्विद्धं वनं परशुना हतम्।
वाचा दुरुक्तं बीभत्सं न संरोहति वाक्षतम्।। = बाणों से बींधा हुआ घाव फिर भर जाता है, कुल्हाडे से काटा वन फिर हरा-भरा हो जाता है, परन्तु कटुवचनों द्वारा वाणी से किया गया हृदय का घाव  कभी नहीं भरता।

दृष्टिपूतं न्यसेद् पादं वस्त्रपूतं जलं पिबेत्।
शास्त्रपूतं वदेद् वाक्यं मनःपूतं समाचरेत्।। = मनुष्य को चाहिए कि अच्छी प्रकार देखकर कदम उठाए, कपड़े से छानकर पानी पीए, सत्यशास्त्रों के अनुकूल वाणी बोले और मन से सोच-विचार कर शुभ आचरण करे।

विप्रो वृक्षस्तस्य मूलं च सन्ध्या वेदाः शाखा धर्मकर्माणि पत्रम्।
तस्मान्मूलं यत्नतो रक्षणीयं छिन्ने मूले नैव शाखा न पत्रम्।। = ब्राह्मणरूपी वृक्ष की जड़ संध्या है, वेद उसकी शाखाएं हैं और धर्मकर्म उसके पत्ते हैं। अतः प्रयत्नपूर्वक जड़ की रक्षा करनी चाहिए क्योंकि जड़ के कट जाने या नष्ट हो जाने पर शाखा और पत्ते भी नहीं रहते।

शुभेन कर्मणा सौख्यं दुःखं पापेन कर्मणा।
कृतं फलति सर्वत्र नाकृतं भुज्यते क्वचित्।। = शुभ कर्म करने से सुख और पाप कर्म करने से दुःख मिलता है। अपना किया हुआ कर्म सर्वत्र ही फल देता है। बिना किए हुए कर्म का फल नहीं भोगा जाता।

अज्ञः सुखमाराध्यः सुखतरमाराध्यते विशेषज्ञः।
ज्ञानलवदुर्विदग्धं ब्रह्मापि तं नरं न रञ्जयति।। = अबोध को समझाना सरल है, बुद्धिमान को भी समझाना सरल है, किन्तु अधकचरे ज्ञान से ही अपने आप को पण्डित माननेवाले मनुष्य को चारों वेदों के ज्ञाता ब्रह्मा भी सच नहीं समझा सकते।

एकेनाऽपि हि शूरेण पादाक्रान्तं महीतलम्।
क्रियते भास्करेण परिस्फुरित तेजसा।। = जैसे सूर्य अपने प्रखर प्रकाश से सारी पृथ्वी को परिव्याप्त कर देता है, उसी प्रकार शूरवीर अपने प्रबल पराक्रम से सारे संसार को पादाक्रान्त कर लेता है।

न कश्चिच्चण्डकोपानामात्मीयो नाम भूभुजाम्।
होतारमपि जुह्नानं स्पृष्टो दहति पावकः।। = प्रचण्ड क्रोधी राजाओं का कोई अपना नहीं होता। जैसे छू जाने पर अग्नि हवन करनेवाले को भी जला डालती है, ऐसे ही क्रुद्ध होने पर राजा लोग अपने मित्रों को भी नहीं छोड़ते।

नैवाकृतिः फलति नैव कुलं न शीलम् विद्याऽपि नैव न च यत्नकृताऽपि सेवा।
भाग्यानि पूर्वतपसा खलु सञ्चितानि काले फलन्ति पुरुषस्य यथैव वृक्षाः।। = मनुष्य को न तो सुन्दर आकृति (रंग-रूप) फल देती है, न उत्तम कुल, न शील, न कलाकौशल और न हि यत्नपूर्वक की गई सेवा; पूर्व जन्मकृत तप के द्वारा संचित भाग्य ही समय पर वृक्ष की भांति फल देता है। अर्थात् विपरीत भाग्य प्रबल हो तो वर्तमान् का किया गया पुरुषार्थ प्रभावी नहीं दिखाई पड़ता।

वने रणे शत्रुजलाग्निमध्ये महार्णवे पर्वतमस्तके वा।
सुप्तं प्रमत्तं विषमस्थितं वा रक्षन्ति पुण्यानि पुराकृतानि।। = वन में, युद्ध में, शत्रुओं के बीच, जल में, अग्नि में, समुद्र में, पर्वत की चोटी पर, सुप्त अवस्था में असावधानी की दशा में, विषम स्थितियों में मनुष्य के पूर्वजन्मकृत सुकर्म ही रक्षा करते हैं।

भीमं वनं भवति तस्य पुरं प्रधानं सर्वो जनः स्वजनतामुपयाति तस्य।
कृत्स्ना च भूर्भवति सन्निधिरत्नपूर्णा यस्यास्ति पूर्वसुकृतं विपुलं नरस्य।। जिस मनुष्य के पूर्वजन्म में किए शुभकर्मों का पुण्यफल प्रबल है, उसके लिए भयंकर वन भी श्रेष्ठ नगर बन जाता है, सब लोग उसके मित्र स्वजन बन जाते हैं और सारी पृथ्वी उसके लिए उत्तम निधियों और रत्नों से परिपूर्ण हो जाती है।



संस्कृतं वद आधुनिको भव।
वेदान् पठ वैज्ञानिको भव।।

इति

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