पाठ: (20) पञ्चमी विभक्ति (4)


(दूर और समीपवाची शब्दों के साथ जिससे दूर या समीप की चर्चा हो उसमें पञ्चमी और षष्ठी दोनों विभक्तियों का प्रयोग किया जाता है तथा दूर और समीपवाची शब्दों में द्वितीया, तृतीया, पञ्चमी व सप्तमी विभक्ति का प्रयोग होता है।)
त्वं विद्यालयात् दूरं गच्छ = तू विद्यालय से दूर जा।
त्वं विद्यालयात् दूरात् गच्छ = तू विद्यालय से दूर होकर के जाना।
विद्यालयस्य समीपात् मा गच्छ = विद्यालय के समीप होकर मत जा।
पितुः सकाशं गच्छामि = पिता के पास जा रहा हूं।
पितुरभ्याशादागच्छामि = पिता के पास से आ रहा हूं।
ग्रामः नगरात् दूरं दूरे वा वर्तते = गांव नगर से दूर है।
सा मम मत् वा सकाशात् रुप्यकाणि अनयत् = वह मेरे पास से पैसे ले गई।
तस्याः समीपे मम रुप्यकाणि सन्ति = उसके पास मेरे पैसे हैं।
गृहस्य/गृहात् अन्तिकादेव मम आपणः अस्ति = घर के पास ही मेरी दुकान है।
मम मत् वा निकषा माऽऽगच्छ, दूरादेव वद = मेरे पास (निकट) मत आ, दूर से ही बोल।
पुत्रः मत् दूरं अभूत् = बेटा मेरे से दूर हो गया।
बालः स्वस्मात् विप्रकृष्टं विप्रकृष्टे वा पाषाणं क्षिपति = बच्चा अपने से दूर पत्थर फैंकता है।

(पृथक्, विना एवं नाना शब्दों के साथ तृतीया तथा पञ्चमी का प्रयोग होता है। विना के साथ द्वितीया का भी प्रयोग होता है।)

पुत्रः पितृभ्यां पृथक् वसति = बेटा मां-बाप से अलग रहता है।
पत्रं वृक्षात् वृक्षेण वा पृथक् अभूत् = पत्ता पेड़ से अलग हो गया।
पादतलं पादत्राणात् पादत्राणेन वा पृथक् बुभूषति = जूते का तलवा जूते से अलग होनेवाला है।
सुधालेपनं भित्तिकायाः भित्तिकया वा पृथक् जायते = चूने की पुताई दीवार से अलग हो रही है।
संमर्दे बालः मात्रा मातुर्वा पृथक् संजातः = भीड़ में बच्चा मां से अलग हो गया।
बालिका स्वीयया पाञ्चालिकया स्वीयायाः पाञ्चालिकायाः वा पृथक् कृता = बच्ची को अपनी गुड़िया से अलग कर दिया गया।
अकालं कश्चिदपि स्वजनैः स्वजनेभ्यो वा पृथक् मा भूयात् = कोई भी समय से पहले अपने स्वजनों से अलग न होवे।
ईश्वरम् ईश्वरेण ईश्वरात् वा विना सृष्टिः कथं चलेत् ? = ईश्वर के बिना सृष्टि कैसे चल सकती है ?
कर्म कर्मणा कर्मणो वा विना फलं न लभते = कर्म के बिना फल नहीं मिलता।
पुरुषकारं पुरुषकारेण पुरुषकाराद् वा विना सुखं न भवति = पुरुषार्थ के बिना सुख नहीं होता।
धर्मं धर्मेण धर्माद् वा विना कुतः सुखम् = धर्म के विना सुख कहाँ ?
अभिषेकम् अभिषेकेण अभिषेकाद् वा स्वपराक्रमेणैव सिंहो राजा उच्यते = बिना अभिषेक के हि सिंह अपने पराक्रम के कारण राजा कहाता है।
गृहिणीं विना कुतो गृहम् ? = गृहिणी के बिना घर कैसा ?
जगतां यदि नो कर्त्ता, कुलालेन विना घटः।
चित्रकारं विना चित्रं, स्वतः एव भवेत्तथा।। = यदि जगत् का बनानेवाला कोई नहीं है, तो जैसे बिना बनानेवाले के जगत् बन गया वैसे ही बिना कुम्हार के घड़ा तथा बिना चित्रकार के चित्र बन जाने की बात भी मान लेनी चाहिए।
पानीयं प्राणिनां प्राणा विश्वमेव च तन्मयम्।
न हि तोयाद् विना वृत्तिः स्वस्थस्य व्याधितस्य वा।। = जल जीवसृष्टि का प्राण है और सारा विश्व जलमय ही है। स्वस्थ हो या रोगी, जल के बिना किसी का जीवन सम्भव नहीं है।
सुखार्थाः सर्वभूतानां मताः सर्वाः प्रवृत्तयः।
सुखं च न विना धर्मात्तस्माद् धर्मपरो भवेत्।। = सभी प्राणियों की किसी भी कार्य को करने की जितनी प्रवृत्तियां हैं, वे सभी आत्मसुख की प्राप्ति के लिए होती हैं। सुख धर्म के बिना नहीं मिलता, अतः मनुष्य को धर्म परायण होना चाहिए।
न हि कारणं विना कार्याेत्पत्तिः सम्भविनी = कारण के बिना कार्योत्पत्ति सम्भव नहीं है।
कुलेन कुलाद् वा नानाभूय गतः = कुल से अलग होकर चला गया।
अन्यकुलाद् ऊढ्वा आगतस्तस्मात् कुलेन कुलाद् वा नानाकृतः = भिन्न कुल से विवाह कर लिया अतः कुल से अलग कर दिया।
गुणाः मनुष्यान् दुर्जनैः दुर्जनाद् वा नानाकुर्वन्ति = गुण मनुष्यों को दुर्जनों से अलग कर देते हैं।
प्रतिदिनं कलहेण पित्रा अनुजः अग्रजेन अग्रजाद् वा नानाकृतः = प्रतिदिन के झगड़ों के कारण पिता ने छोटे भाई को बड़े भाई से अलग कर दिया।

(‘ऋते’ के साथ भी द्वितीया, तृतीया व पञ्चमी का प्रयोग देखा जाता है।)
ऋते ज्ञानान्न मुक्तिः = ज्ञान के बिना मुक्ति नहीं।
पालकादृते शिशवः कथं पाल्यन्ते ? = पालक के बिना बच्चे कैसे पल सकते हैं ?
यत् प्रज्ञानमुत चेतो धृतिश्च यज्ज्योतिरन्तरमृतं प्रजासु।
यस्मान्न ऋते किं चन कर्म क्रियते तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु।। = जो प्रकृष्ट ज्ञान का साधन है, चेतना का आधार है, धैर्यादि का साधक है, भीतर विद्यमान ज्ञान का प्रकाशक, उत्पन्न समस्त पदार्थों में अमृत अर्थात् अविनाशी है, जिसके बिना कोई भी कर्म नहीं किया जाता, ऐसा वह मेरा मन शुभ विचारोंवाला होवे।
न स्याद् वनमृते व्याघ्रान् व्याघ्रा न स्युर्ऋते वनम्।
वनं हि रक्ष्यते व्याघ्रैर्व्याघ्रान् रक्षति काननम्।। = व्याघ्रों के बिना वन नहीं है और वन के विना व्याघ्र नहीं। क्योंकि व्याघ्रों के कारण वन की रक्षा होती है और वन से व्याघ्र की।
वनं राजंस्तव पुत्रोऽम्बिकेय सिंहान् वने पाण्डवांस्तात विद्धि।
सिंहैर्विहीनं हि वनं विनश्येद् सिंहा विनश्येयुर्ऋते वनेन।। = हे अम्बिकापुत्र राजन् (धृतराष्ट्र) ! तुम्हारे पुत्र वन सदृश् हैं और पाण्डवों को सिंह सदृश् जानो। सिंहों के बिना वन नष्ट हो जाते हैं और वन के बिना सिंह।

(दो की तुलना में जिससे तुलना की जाए उसमें पञ्चमी विभक्ति होती है।)

रामात्कृष्णः पटुतरोऽस्ति = राम की अपेक्षा से कृष्ण चतुर है।
पठने मालायाः रमा पट्वी वर्तते किन्तु कार्ये रमायाः माला = पढ़ाई में माला की अपेक्षा रमा पटु याने चतुर है, किन्तु काम में रमा की अपेक्षा से माला कुशल है।
भौतिकोन्नतेराध्यात्मिक्युन्नतिर्दुष्कराऽस्ति = भौतिक उन्नति से आध्यात्मिक उन्नति करना कठिन है।
असत्यात् सत्यमृजु वर्तते = असत्य की अपेक्षा सत्य का मार्ग सरल है।
धनाद् धर्मोऽतिरिच्यते = धन की अपेक्षा धर्म श्रेष्ठ है।
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी = जननी और जन्तमभूमि स्वर्ग से भी महान् है।
धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत् क्षत्रियस्य न विद्यते = क्षत्रिय के लिए धर्मयुद्ध से बढ़कर और कोई कर्त्तव्य नहीं है।
सम्भावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते = सम्मानित व्यक्तियों के लिए अपयश मरण से भी बढ़कर है।
नियतं कुरु कर्म त्वं। कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः = शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः = तू नियमितरूप से कर्मों को कर क्योंकि कर्म करना कर्म न करने की अपेक्षा अच्छा है। बिना कर्म के तो यह शरीरयात्रा भी नहीं चल सकती।
श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तपः।
सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते।। = दूसरों को तपानेवाले अर्जुन ! द्रव्ययज्ञ की अपेक्षा ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठ है। क्योंकि सब कर्म ब्रह्मज्ञान हो जाने पर समाप्त हो जाते हैं।
न गृहं गृहमित्याहुर्गृहिणी गृहमुच्यते।
गृहं तु गृहिणीहीनं कान्तारादतिरिच्यते।। = घर को घर नहीं कहते, गृहिणी को घर कहते हैं। गृहिणी के बिना घर जंगल से भी अधिक भीषण होता है।
चन्दनं शीतलं लोके चन्दनादपि चन्द्रमाः।
चन्द्रचन्दनयोर्मध्ये शीतला साधु संगतिः।। = संसार में चन्दन शीतल माना जाता है। चन्द्रमा चन्दन से भी शीतल है। परन्तु चन्द्रमा और चन्दन से भी साधु की संगत अधिक शीतल है।
दारिद्र्यान्मरणं वरम् = दरिद्रता की अपेक्षा मर जाना श्रेष्ठ है।
नास्ति कामसमो व्याधिर्नास्ति मोहसमो रिपुः।
नास्ति कोपसमो वह्निर्नाऽस्ति ज्ञानात्परं सुखम्।। = काम के समान दूसरी कोई व्याधि नहीं है, मोह के समान दूसरा कोई शत्रु नहीं है। क्रोध के समान दूसरी कोई आग नहीं है और आत्मज्ञान से बढ़कर कोई सुख नहीं है।
सत्यमेवेश्वरो लोके सत्ये धर्मः सदाश्रितः।
सत्यमूलानि सर्वाणि सत्यान्नास्ति परं पदम्।। = संसार में सत्य ही समर्थ है, सदा सत्य के आधार पर ही धर्म है। सत्य ही सबकी जड़ है, सत्य से बढ़कर दूसरा कोई परं पद नहीं है।
अज्ञेभ्यो ग्रन्थिनः श्रेष्ठाः ग्रन्थिभ्यो धारिणो वराः।
धारिभ्यो ज्ञानिनः श्रेष्ठाः ज्ञानिभ्यो व्यवसायिनः।। = अज्ञ अर्थात् मूर्ख से ग्रन्थ पढ़नेवाले श्रेष्ठ हैं, ग्रन्थ पढ़नेवालों से उसे स्मरण करनेवाले (=रटनेवाले) श्रेष्ठ हैं। रटनेवालों से ग्रन्थस्थ ज्ञान को समझनेवाले और समझने वालों से भी तदनुकूल आचरणकर्ता श्रेष्ठ होते हैं।
शान्तितुल्यं तपो नास्ति न सन्तोषात्परं सुखम्।
न तृष्णयाः परो व्याधिर्न च धर्मो दयापरः।। = शान्ति के समान कोई तप नहीं है और सन्तोष से बढ़कर कोई सुख नहीं। तृष्णा से बढ़कर कोई रोग नहीं और दया से बढ़कर कोई धर्म नहीं है।
विषाद् विषं किं ? विषयाः समस्ताः = विष से भी अधिक विषाक्त क्या है ? समस्त विषयभोग।
वज्रादपि कठोराणि मृदूनि कुसुमादपि।
लोकोत्तराणां चेतांसि को नु विज्ञातुमर्हसि।। = महापुरुषों का हृदय वज्र से भी कठोर और फूल से भी कोमल होता है। उसे जानने में कौन समर्थ हो सकता है ?
तृणं लघु तृणात्तूलं तूलादपि च याचकः।
वायुना किं न नीतोऽसौ मामयं याचयिष्यति।। = तिनका अत्यन्त हलका होता है, तिनके से भी रुई अधिक हल्की होती है और रुई से भी याचक अधिक हल्का होता है। (प्रश्न होता है यदि रुई से भी याचक हल्का है तो..) वायु उसे उड़ा क्यों नहीं ले जाती ? (उत्तर है कि वायु को भी यह डर है कि..) कहीं यह याचक मुझसे भी न मांग ले।
वरं प्राणपरित्यागो मानभङ्गेन जीवनात्।
प्राणत्यागे क्षणं दुःखं मानभङ्गे दिने-दिने।। = अपमानित होकर जीने की अपेक्षा मर जाना अधिक श्रेष्ठ है। क्योंकि मरने के समय तो क्षणभर के लिए कष्ट होता है, परन्तु अपमानित होने पर तो प्रतिदिन दुःख भोगना पड़ता है।
प्रक्षालनाद्धि पङ्कस्य दूरादस्पर्शनं वरम् = पैर कीचड़ में डालकर धोने की अपेक्षा कीचड़ में न डालना ही अच्छा है।
संन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ।
तयोस्तु कर्मसंन्यासात् कर्मयोगो विशिष्यते।। = संन्यास अर्थात् सकाम कर्मों का त्याग तथा कर्मयोग अर्थात् निष्काम कर्मों का करना दोनों ही परम कल्याण याने मोक्ष को करनेवाले हैं। परन्तु इन दोनों में सकाम कर्म के त्याग की अपेक्षा निष्काम कर्म का करना अधिक अच्छा है।
तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः।
कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन।। = योगी तपस्वियों से बड़ा है, ज्ञानियों (अनुभवरहितों) से भी बड़ा है, कर्मकाण्डियों से भी बड़ा है। इसलिए हे अर्जुन तू योगी बन।

आचार्या शीतल जी आर्ष गुरुकुल अलियाबाद
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