पाठ: (15) चतुर्थी विभक्ति(2) +पूर्वरूप सन्धिः


(अच्छा लगना अर्थ की धातुओं के साथ जिसको अच्छा लगता है, उसकी सम्प्रदान संज्ञा होती है और सम्प्रदान कारक में चतुर्थी विभक्ति होती है।)
शिशवे क्रीडनकं रोचते = बच्चे को खिलौना अच्छा लगता है।
घस्मराय मोदकाः रोचन्ते = खाऊ को लड्डू अच्छे लगते हैं।
कृष्णाय दुर्योधनस्य पक्वान्नं नारोचिष्ट किन्तु विदुरस्य श्राणा अरोचिष्ट = कृष्ण को दुर्योधन के पक्वान्नअच्छे नहीं लगे किन्तु विदुर की भाजी अच्छी लगी।
मूढभारतीयेभ्यः क्षुद्रा आंग्लसंस्कृतिः रोचते किन्तु विश्ववारा वैदिेेक संस्कृतिः न = मूर्ख भारतीयों को क्षुद्र पाश्चात्य संस्कृति अच्छी लगती है किन्तु सबके द्वारा वरणीय वैदिक संस्कृति अच्छी नहीं लगती।
यैः भारतमाता दासतां याता तानि सर्वाणि दूषणानि अद्यापि मूढेभ्यः रोचन्ते = जिन कारणों से भारत गुलाम हुआ वे सब बुराइयां आज भी मूढ़ लोगों को अच्छी लगती हैं।
इदं कटुसत्यं सर्वेभ्यः न रोचिष्यते इति जानाम्यहं = यह कड़वा सच सभी को अच्छा नहीं लगेगा यह मैं जानती / जानता हूं।
कंसाय अत्याचारः रोचते स्म = कंस को अत्याचार करना अच्छा लगता था।
देशप्रेमिभ्यः स्वराष्ट्रं रोचताम् = देशप्रेमियों को स्वदेश अच्छा लगना चाहिए।
स्वतन्त्र-स्वस्थ-संघटित-भारतवर्षाय आवश्यकमस्ति यद् सर्वेभ्यः स्वभाषा, स्वभूषा, स्वभोजनं, भारती च रोचन्ताम् = स्वतन्त्र, स्वस्थ, संगठित भारत बनाने के लिए आवश्यक है कि सब को अपनी भाषा, अपना वेश, अपना खानपान तथा संस्कृत भाषा अच्छी लगे।
भरतमुनये मृगशावकं रुरुचे यत्तस्य बन्धाय अभूत = भरतमुनि को हिरण का बच्चा अच्छा लगा था जो उनके बन्धन (= पतन) का कारण बना।
रामाय पितुराज्ञापालनाय वनगमनम् अरोचत = राम को पिता की आज्ञा का पालन करने के लिए वन जाना अच्छा लगा था।
भरताय राज्यं नारोचत = भरत को राज्य करना अच्छा नहीं लगा।
भृष्ट-भण्टाकी मह्यम् अतीव स्वदते = बैंगन का भरता मुझे बहुत अच्छा लगता है।
सुसिम्बयुक्तं पुलाकं आवुत्ताय स्वदिष्यते = फ्रेंचबीनवाला पुलाव जीजा को अच्छा लगेगा।
स्वास्थाय ज्येष्ठाम्बायै कर्कटी ज्येष्ठ ताताय च चर्भटी स्वदेत = स्वास्थ्य के लिए ताई को ककड़ी तथा ताऊ को खीरा अच्छा लगना चाहिए।
आलूक्याः पक्ववटी भागिनेयाय अस्वदत = अरबी की पकौड़ी भानजे को अच्छी लगती थी।
स्वस्रीयाय रामकोशातकी कोशातकी चापि अस्वदिष्ट = भानजे को भिण्डी तथा तोरई भी अच्छी लगती थी।
स्वस्रीयायै अपि जालिनी स्वदते स्म = भानजी को भी तोरई अच्छी लगती थी।
अम्लिकया सह कुष्माण्डं बहुभ्यः जनेभ्यः रोचते = इमली डालकर पकाया हुआ काशीफल बहुतों को स्वादिष्ट लगता है।

{क्रोध (= गुस्सा), द्रोह (बुरा चाहना, मारने की इच्छा), ईर्ष्या (= जलन) तथा असूया (= गुणों को भी दोष बताना) इन अर्थवाली धातुओं के साथ जिसके प्रति क्रोधादि किया जाता है उसकी सम्प्रदान संज्ञा होती है, तथा उसमें चतुर्थी विभक्ति का प्रयोग होता है।}

गुरुः शिष्येभ्यः क्रुध्यति = गुरु शिष्यों पर गुस्सा करता है।
सीता रावणाय अक्रुध्यत् = सीता ने रावण पर गुस्सा किया।
भीमः दुर्योधनाय चुक्रोध = भीम ने दुर्योधन पर गुस्सा किया।
यदि चौर्यं करिष्यसि तातः तुभ्यं क्रोत्स्यति = यदि तू चोरी करेगा तो पिताजी तुझ पर गुस्सा करेंगे।
दौवारिकः भिक्षुकाय अक्रुधत् = द्वारपाल ने भिखारी पर गुस्सा किया।
चण्डी दुष्टाय कथं न चण्डते ? = चण्डी दुष्टों पर गुस्सा क्यों नहीं करतीं ?
दुर्गावती अकबरस्य सेनापतये चचण्डे = दुर्गावती ने अकबर के सेनापति पर क्रोध किया।
रणचण्डी लक्ष्मीबाई अंग्रेजशासकेभ्यः अचण्डत = रणचण्डी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेज शासकों पर गुस्सा किया।
दयानन्दः विषदाय पाचकाय न अचण्डिष्ट = दयानन्द जी ने विषदाता रसोइए पर गुस्सा नहीं किया।
भामिनी भर्त्ताय भामते = गुस्सैल पत्नी अपने पति पर गुस्सा कर रही है।
पुत्राय कुपितोऽपि पिता तं पालयति = पुत्र पर कुपित होने के बावजूद भी पिता उसे पालता है।
प्रेम्णा पालितोऽपि पुत्रः वृद्धाय पित्रे कुप्यति = लाड़-प्यार से पाला हुआ भी पुत्र बूढ़े पिता पर गुस्सा करता है।
विश्वामित्रः रक्षोभ्यः चुकोप = विश्वामित्र ने राक्षसों पर गुस्सा किया।
भर्त्ता भार्याय भामयति = पति पत्नी पर गुस्सा करता है।
मशकः कर्णे मशति अतः सः मशकाय मशति = मच्छर कान में आवाज करता है इसलिए वह मच्छर पर गुस्सा करता है।
रुष्टा सुता पित्रे रोषयति = रूठी हुई लाड़ली बेटी पिता पर गुस्सा दिखाती है।
अयं ह तुभ्यं वरुणो हृणीते = यह वरुण भगवान तुझसे क्रुद्ध है।
दुष्टाः सज्जनेभ्यो द्रुह्यन्ति = दुष्ट लोग सज्जनों से द्रोह करते हैं।
सर्वथा सर्वदा सर्वभूतेभ्यः अद्रोहः हिंसा = सब प्रकार से तीनों कालों में समस्त प्राणियों का बुरा न चाहना अहिंसा है।
दुष्टान् अवश्यं दण्डयेत् किन्तु लेशमात्रमपि न द्रुह्येत् = दुष्टों को अवश्य दण्ड देवे किन्तु उनसे लेशमात्र भी द्रोह न करे (अर्थात् उनका बुरा न चाहे)।
वन्ध्या प्रजावतीभ्यः ईर्ष्यति = बांझ महिला सन्तानोंवाली माताओं से जलती (ईर्ष्या करती) है।
दुर्योधनः युधिष्ठिरस्य वैभवं दृष्ट्वा ईर्क्ष्यति स्म = दुर्योधन युधिष्ठिर का वैभव देखकर ईर्ष्या करता था।
असुराः सर्वदा सुरेभ्यः सूर्क्ष्यन्ति = असुर हमेशा देवों से ईर्ष्या करते हैं।
मा भ्राता भ्रात्रे इरस्येत् = भाई भाई से ईर्ष्या न करे।
पशुतः शिक्षेत् कस्मायपि न इरज्येत् कदाचन = पशुओं से सीखे कभी भी किसी से ईर्ष्या न करे।
कस्मायपि नासूयति सा अनुसूया = जो किसी में भी एब नहीं निकालती वह अनुसूया है।
अकुशलाः कुशलेभ्यः असूयन्ति = अकुशल व्यक्ति कुशल व्यक्ति में एब निकालता है।
विरोधिनः प्रतिभाशालिने दयानन्दाय अनसूयन् = विरोधी दयानन्द जी की प्रतिभा देखकर असूया करते थे।

(यदि उपसर्गपूर्वक क्रुध् या द्रुह् धातु का प्रयोग किया गया हो तो जिसके प्रति क्रोध या द्रोह किया जाता है उसकी कर्म संज्ञा होती है, अतः उसमें द्वितीया विभक्ति का प्रयोग होता है।)

मन्थरया प्रेरिता कैकेयी दशरथम् अभ्यक्रुध्यत् = मन्थरा से प्रेरित कैकेयी ने दशरथ पर गुस्सा किया।
जनकः धृष्टात्मजम् अभिक्रुध्यत् = पिता ढीठ बेटे पर गुस्सा कर रहा है।
दोषदूरीकरणायैव बालम् अभिक्रुध्येत् न अन्यथा = दोषों को दूर करने की दृष्टि से ही बालक पर गुस्सा करे अन्य किसी प्रयोजन से नहीं।
सः महापाप्मा अस्ति यः राष्ट्रम् अभिद्रुह्यति = वह बड़ा पापी है जो राष्ट्र से द्रोह करता है।
रे पामर पालकम् अभ्यद्रुह्यत् = पालक से ही द्रोह किया... बड़ा ही नीच व्यक्ति है।

पूर्वरूप सन्धिः

एङ्ः पदान्तादति। एङ् = ए, ओ। पदान्त ‘ए’ या ‘ओ’ के बाद यदि ‘अ’ हो तो ‘अ’ को पूर्वरूप हो जाता है अर्थात् ‘अ’ पूर्व विद्यमान ‘ए’ या ‘ओ’ में मिल जाता है। इस सन्धि को दिखाने के लिए  अवग्रह (ऽ) चिह्न का प्रयोग किया जाता है जो कि ऐच्छिक है।
ए + अ = एऽ / ए।
आत्मने + अपि = आत्मनेऽपि / आत्मनेपि।
ओ + अ = ओऽ / ओ।
गुरो + अत्र = गुरोऽत्र / गुरोत्र।

दूरे + अस्तु = दूरेऽस्तु।
रत्नाकरो जलनिधिरित्यसेवि धनाशया। धनं दूरेऽस्तु वदनमपूरी क्षारवारिभिः।। = समुद्र रत्नों का भण्डार है ऐसा मानकर धन की आशा से उस का सेवन किया। धन तो दूर रहा, मुख खारे पानी से भर गया।

अश्नुते + अत्र = अश्नुतेऽत्र।
अश्नुतेऽत्र कल्याणं व्यसने यो न मुह्यति = जो मुसीबत में नहीं घबराता वही यहां (संसार) में सुख भोगता है।

ते + अब्रुवन् = तेऽब्रुवन्।
तेऽब्रुवन् मुनिं भगवन् व्याख्याहि नः सदाचारम् = उन्होने मुनि से कहा भगवन् हमें सदाचाार का उपदेश दो।

परिवर्त्तन्ते + अत्र = परिवर्त्तन्तऽत्र।
चक्रवत्परिवर्त्तन्तेऽत्र दुःखानि च सुखानि च = चक्र के समान सुख-दुःख बदलते रहते हैं। (चार दिन की चांदनी फिर अंधेरी रात)

भक्षिते + अपि = भक्षितेऽपि।
भक्षितेऽपि लशुने शांतो व्याधिः = (लहसून न खाने का व्रत होने पर भी) लहसून खाने पर भी रोग नहीं हटा। (जेहि के कारण मूंड मुंडावा, सो दुःख मोरे आगे आवा।)

दुग्धधौतो + अपि = दुग्धधौतोऽपि।

दुग्धधौतोऽपि किं याति वायसः कलहंसताम् = दूध से धोने पर भी क्या कौआ राजहंस बन सकता है ?

भूयो + अपि = भूयोऽपि।
भूयोऽपि सिक्तः पयसा घृतेन न निम्बवृक्षो मधुरत्वमेति = दूध-घी से लाख सींचने पर भी नीम मीठा नहीं बनता।

वैद्यो + अपि = वैद्योऽपि।
धन्वन्तरिर्वैद्योऽपि किं करोति गतायुषि = आयु बीत जाने पर धन्वन्तरी भी क्या कर सकता है ?

को + अपि = कोऽपि।
रामस्य दैवदुर्नियोगः कोऽपि यद् वनं गतः = राम का कोई दुर्भाग्य था जिसके कारण वह वन गया।

गतो + अस्या = गतोऽस्याः।
अतिभूमिं गतोऽस्याः अनुरागः = इसका प्रेम सीमा से बाहर हो गया है।

एरण्डो + अपि = एरण्डोऽपि।
निरस्तपादपे देशे एरण्डोऽपि द्रुमायते = जहां दरख्त (बड़े पेड़) नहीं होते वहां एरण्ड पौधा भी वृक्ष माना जाता है। (अन्धों में काना राजा।)

पञ्जरशेषो + अपि = पञ्जरशेषोऽपि।
न स्पृशति पल्वलाम्भः पञ्जरशेषोऽपि कुञ्जरः = पंजरमात्र रह जाने पर भी हाथी कभी छिछली तलैया का पानी नहीं छूता।

कल्पवृक्षो + अपि = कल्पवृक्षोऽपि।
कल्पवृक्षोऽप्यभव्यानां प्रायो याति पलाशताम् = भाग्य हीनों के लिए कल्पवृक्ष भी ढाक का पेड़ बन जाता है।

पलाशो + अपि = पलाशोऽपि।
पुरुषार्थेन पलाशोऽपि कल्पवृक्षतामेति = पुरुषार्थ से ढाक भी कल्पवृक्ष बन जाता है।

आचार्या शीतल जी आर्ष गुरुकुल अलियाबाद
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