पाठ: (29) सप्तमी विभक्ति (3)


(अभिव्यापक आधार- ऐसा आधार जिसके साथ आधेय का व्याप्य-व्यापक सम्बन्ध हो, उसको अभिव्यापक आधार कहते हैं।)
गुडे माधुर्यं वर्तते = गुड़ में मिठास है।
जले शैत्यं वर्तते = पानी में शीतलता होती है।
तिलेषु तैलं केन पूरितम् ? = तिलों में तेल किसने भरा है ?
दधनि सर्पिर्भवति, परं न दृश्यते = दही में घी होता है किन्तु दीखता नहीं है।
तथैव सर्वत्र ईश्वरोऽपि वर्तते, केवलं ज्ञानचक्षुषैव दृश्यते = वैसे ही ईश्वर सर्वत्र विद्यमान है, किन्तु केवल ज्ञान की आंखों से ही दिखाई देता है।
यावद् देहे प्राणो वसति तावत् प्राणी जीवति = जब तक शरीर में प्राण है, तब तक प्राणी जीवित रहता है।
यस्मिन् काष्ठेऽग्निरस्ति, तदेव जलति, तदेव ज्वालयितुं शक्यते = जिस लकड़ी में आग है, वही जलती है, उसे ही जलाना सम्भव है।
पुष्पे गन्धं दृष्ट्वा क्षुद्रा तत्रैवोपविष्टा = फूल में गन्ध देखकर मधुमक्खी वहीं बैठ गई।
यथा सिकतासु तैलं नास्ति तथैव प्रकृतौ चैतन्यं नास्ति = जैसे रेत में तेल का अभाव है, वैसे ही प्रकृति में चैतन्य का सर्वथा अभाव है।
सुतप्तेऽयोगोलके विद्यमानेनाग्निना दग्धोऽयं वटुः = तपे हुए लोहे के गोले में विद्यमान अग्नि से यह बच्चा जल गया।
मूर्खोऽयं जले घृतमन्वेषयति = मूर्ख है यह जो पानी में घी खोज रहा है।
पुष्पेषु मधु यथा मक्षिकैव पश्यति तथा सर्वेष्वात्मानं ज्ञानिन एव पश्यन्ति = जैसे फूलों में शहद मक्खी को ही दीखता है, वैसे सब में व्यापक ईश्वर केवल ज्ञानियों को ही दीखता है।
यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति।
सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते।। = जो सकल भूत = चराचर जगत् में परमात्मा को देखता है और सब भूतों में परमात्मा को व्यापक देखता है, फिर वह पाप नहीं करता अथवा किसी से घृणा नहीं करता है।
यावत्पवनो निवसति देहे, तावत्पृच्छति कुशलं गेहे।
गतवति वायौ देहापाये, भार्या बिभ्यति तस्मिन्काये।। = जब तक इस देह में प्राण रहता है, तब तक घर में सब कुशल-मंगल पूछते हैं, किन्तु प्राण के छूट जाने पर जब देह गिर जाता है, तब पत्नी भी उस मृत शरीर को देखकर भयभीत हो जाती है।
तोये शैत्यं दाहकत्वं च भानौ तापो भानौ शीतभानौ प्रसादः।
पुष्पे गन्धो दुग्धमध्ये च सर्पिर्यत्तच्छम्भो ! त्वं ततस्त्वां प्रपद्ये।। = पानी में शीतलता, सूर्य में ताप तथा दाहकता, चन्द्रमा में चांदनी, फूल में गन्ध और दूध में घी है हे शम्भो ! (कल्याणकारी परमेश्वर) यह सब तेरी कारीगरी है अतः मैं तेरी शरण आया हूं।
तिलेषु तैलं दधनीव सर्पिरापः स्रोतःस्वरणीषु चाग्निः।
एवमात्माऽऽत्मनि गृह्यतेऽसौ सत्येनैनं तपसा योऽनुपश्यति।। = जैसे तिलों में तेल, दही में घी, स्रोतों में जल, अरणियों में अग्नि रहती है, और तिलों को पीडने से, दही को बिलोने से, स्रोतों को खोदने से, अरणियों को रगड़ने से ये प्रकट होते हैं, वैसे जीवात्मा में परमात्मा निहित है, और वहीं उसका ग्रहण होता है, परन्तु वह दिखता सत्य और तप की रगड़ से है।
सर्वव्यापिनमात्मानं क्षीरे सर्पिरिवार्पितम्।
आत्मविद्यातपोमूलं तद्ब्रह्मोपनिषत्परमिति।। = जैसे दूध के कण-कण में घी व्याप्त है, वैसे समस्त पदार्थों में परमेश्वर व्याप्त है। इस बात को आत्मविद्या और तप से जान लेना ही ”परम ब्रह्मोपनिषद“ कहाता है।
यो देवोऽग्नौ योऽप्सु यो विश्वं भुवनमाविवेश।
यो औषधीषु यो वनस्पतिषु तस्मै देवाय नमो नमः।। = जो देव अग्नि में है, जलों में सम्पूर्ण भुवन में सब जगह पहुंचा हुआ है, जो औषधियों में है, वनस्पतियों में है; उस देव को नमस्कार हो।
अरण्योर्निहितौ जातवेदा गर्भ इव सुभृतो गर्भिणीभिः।
दिवे दिव ईड्यो जागृवद्भिर्हविष्मद्भिर्मनुष्येभिरग्निः एतद्वै तत्।। = दो अरणियों में छिपा अग्नि जैसे रगड़ने से प्राप्त होता है तथा गर्भिणी स्त्री के द्वारा गर्भ जिस प्रकार सुरक्षित रखा जाता है और न दिखने पर भी गर्भिणी का ध्यान सतत उस पर रहता है, वैसे ही सब पदार्थों में विद्यमान, आत्ममन्थन से प्राप्त होनेवाला (अग्निस्वरूप परमात्मा) जागरूक तथा सब पदार्थों को समर्पित करनेवाले मनुष्यों के द्वारा प्रतिदिन सतत स्तुति करने योग्य है। वही यह ब्रह्म है।
पुष्पे गन्धं तिले तैलं काष्ठेऽग्निं पयसि घृतम्।
इक्षौ गुडं तथा देहे पश्याऽऽत्मानं विवेकतः।। = जैसे फूल में गन्ध होती है, तिलों में तेल, काष्ठ में अग्नि, दूध में घृत और ईख में गुड़ होता है, वैसे इस शरीर में आत्मा है। उसको विवेक से देख !
लभेत सिकतासु तैलमपि यत्नेन पीडयन्, पिबेत मृगतृष्णिकासु सलिलं पिपासार्दितः।
कदाचिदपि पर्यटञ्छशविषाणमसादयेत्, न तु प्रतिनिविष्टमूर्खजनचित्तमाराधयेत्।। = प्रयत्नपूर्वक पेरने पर चाहे बालू रेत से तेल निकल आए, प्यासे मनुष्य की प्यास चाहे मृगमरीचिका के जल से बुझ जाए और इधर-उधर घूमते चाहे खरगोश का सींग भी मिल जाए, किन्तु हठधर्मी मूर्ख मनुष्य को मनाना या उसे सुधारना असम्भव है।
गन्धः सुवर्णे फलमिक्षुदण्डे नाऽकारि पुष्पं खलु चन्दनस्य।
विद्वान् धनाढ्यश्च नृपतिश्चिरायुः धातुः पुरा कोऽपि न बुद्धिदोऽभूत्।। = ईश्वर ने सोने में सुगन्ध नहीं डाली, ईख में फल नहीं लगाए, चन्दन के वृक्ष में फूल नहीं खिलाए, विद्वान् को धनी और राजा को दीर्घायु नहीं बनाया। इससे ऐसा निश्चय होता है कि पूर्वकाल में कोई भी परमेश्वर को बुद्धि देनेवाला नहीं था।

(जिस कालविशेष में क्रिया की जाती है, उस कालविशेष को कालाधिकरण कहते हैं।)

गुरुकुले छात्राः प्रातःकाले चतुर्वादने जाग्रति = गुरुकुल में छात्राएं सुबह चार बजे जगती हैं।
प्रातःकाले सविता उदेति सायंकाले अस्तमेति = सुबह सूर्य उगता है, शाम को ढल जाता है।
प्रदूषणकारणाद् अद्यत्वे प्रावषि र्वृष्टिर्न भवति = प्रदूषण के कारण आज-कल वर्षा ऋतु में बारिश नहीं होती है।
पीनो देवदत्तो दिवसे न भुङ्क्ते = मोटा देवदत्त दिन में नहीं खाता है।
पौर्णमास्यां मासः समाप्यतेऽतः सा पूर्णमासी कथ्यते = पूर्णिमा के दिन महिना पूरा होता है, अतः वह पूर्णमासी कहाती है।
यस्मिन् दिने सूर्यचन्द्रमसौ पृथिव्या एकस्मिन्पक्षे सह भवतः, तद्दिनं अमावास्या उच्यते = जिस दिन सूर्य और चन्द्रमा पृथ्वी की अपेक्षा से एक ही दिशा में रहते हैं, उस दिन को अमावास्या कहते हैं।
दिवा मा स्वाप्सीः = दिन में मत सोओ।
रात्रौ मा भुञ्जीत = रात में मत खाओ।
सदा सत्यं वद = हमेशा सत्य बोलो।
अधर्माचरणाद् दिने-दिने, गृहे-गृहे कलहो दृश्यते = अधर्माचरण के कारण प्रतिदिन प्रत्येक घर में झगड़े होते हैं।
ग्रीष्मर्तौ मध्याह्ने मार्तण्डः भृशं तपति = गरमियों में दोपहरी में सूर्य खूब तपता है।
अतिवृष्टौ जलाधिक्यात् प्राणिनो म्रियन्ते, अनावृष्टौ जलाभावाद् = वर्षाधिक्य में (बाढ़ में) पानी के बढ़ जाने से प्राणी मर जाते हैं और अनावृष्टि में पानी के अभाव से।
विद्यालयेषु रविवासरेऽवकाशो भवति, किन्तु अस्माकं गुरुकुले अष्टम्यां पूर्णमास्याम् अमावस्याञ्चावकाशो विद्यते = विद्यालयों में रविवार को छुट्टी होती है, किन्तु हमारे गुरुकुल में चतुर्दशी, पूर्णिमा तथा अमावस्या के दिन अवकाश होता है।
पञ्चमेऽहनि षष्ठे वा शाकं पचति स्वगृहे।
अनृणी चाप्रवासी च स वारिचर मोदते।। = हे यक्ष ! भले ही कोई पांचवे या छठे दिन में अपने घर में शाक पकाकर खाता हो, किन्तु यदि वह किसी का ऋणी नहीं है और विदेश में नहीं रहता है तो वह सुखी माना जाता है।
धर्मार्थकाममोक्षाणां यस्यैकोऽपि न विद्यते।
जन्म-जन्मनि मर्त्येषु मरणं तस्य केवलम्।। = जिस मनुष्य ने अपने जीवन में धर्म अर्थ काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों में से एक भी नहीं प्राप्त किया उसे प्रत्येक जन्म में मृत्युलोक में मरण ही प्राप्त होता है।
वृद्धकाले मृता भार्या बन्धुहस्ते गतं धनम्।
भोजनं च पराधीनं तिस्रः पुंसां विडम्बना।। = वृद्धावस्था में पत्नी का देहान्त हो जाना, अपने धन का बन्धुओं के हाथ में चला जाना और भेजन के लिए दूसरों का मूंह तकना; ये तीनों बातें मनुष्य के लिए अत्यन्त दुःखदायी हैं।
युगान्ते प्रचलते मेरुः कल्पान्ते सप्त सागराः।
साधवः प्रतिपन्नार्थान् न चलन्ति कदाचन।। = युग के अन्त में सुमेरु पर्वत चलायमान हो जाता है, कल्पान्त में सातों समुद्र भी अपनी मर्यादा छोड़ देते हैं, परन्तु श्रेष्ठ पुरुष अपने हाथ में लिए हुए कार्य से अथवा अपनी प्रतिज्ञा से कभी भी विमुख नहीं होते हैं।
वरं प्राणपरित्यागो मानभङ्गेन जीवनात्।
प्राणत्यागे क्षणं दुःखं मानभङ्गे दिने दिने।। = अपमानित होकर जीने की अपेक्षा मर जाना अधिक अच्छा है, क्यों कि मरते समय तो क्षणभर के लिए कष्ट होता है परन्तु अपमानित व्यक्ति का हर दिन दुःखदायी होता है।
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे।। = साधुओं की रक्षा के लिए, दुष्टों के विनाश के लिए तथा धर्म की स्थापना के लिए मैं श्रेष्ठ जनों को प्रत्येक युग में उत्पन्न करता हूं।
निन्दन्तु नीतिनिपुणा यदि वा स्तुवन्तु, लक्ष्मीः समाविशतु गच्छतु वा यथेष्टम्।
अद्यैव मरणमस्तु युगान्तरे वा, न्याय्यात्पथः प्रविचलन्ति पदं न धीराः।। = नीतिनिपुण लोग चाहे निन्दा करें या प्रशंसा, मनचाहा धनैश्वर्य प्राप्त होता हो या चला जाता हो, दीर्घजीवी हों या आज ही मौत का सामना करना पड़ जाए किन्तु धीर पुरुष न्यायसङ्गत मार्ग से एक पग भी इधर-उधर नहीं हटते।
या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः।। = प्राणीमात्र के लिए जो रात होती है, उसमें संयमी पुरुष जागता रहता है। जिसमें प्राणीमात्र जाग रहे होते हैं, ज्ञानचक्षु से देखनेवाले मुनि के लिए वह रात होती है।
यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति।
तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च।। = जब तेरी बुद्धि मोह के दलदल से पार हो जाएगी, तब सुनने योग्य तथा जो कुछ तूने अभी सुना है, उन सब के प्रति उदासीन हो जाएगा।
न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे।। = यह आत्मा न कभी उत्पन्न होता है न मरता है। ऐसा भी नहीं कि एक बार यह अस्तित्व में आ गया तब फिर दोबारा नहीं होगा। यह अजन्मा है, नित्य है, शाश्वत है, पुरातन है। शरीर के वध हो जाने पर भी यह मरता नहीं है।




संस्कृतं वद आधुनिको भव।
वेदान् पठ वैज्ञानिको भव।।
 इति

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