पाठ: (27) सप्तमी विभक्ति (1)


(कर्त्ता व कर्म के आधार को अधिकरण कहते हैं। अधिकरण कारक में सप्तमी विभक्ति होती है। व्याख्याकारों ने आधार तीन प्रकार के माने हैं- 1. औपश्लेषिक आधार, 2. वैषयिक आधार तथा 3. अभिव्यापक आधार।
1. औपश्लेषिक आधार: जहां आधार का आधेय के साथ संयोगादि सम्बन्ध हो वहां औपश्लेषिक आधार होता है यथा-)

ऋजीषे रोटिकां भर्जति = तवे पर रोटी सेक रही/रहा है।
तल्पे शेते = गद्दे पर सो रहा/रही है।
नद्यां तरति = नदी में तैर रहा/रही है।
जलाशये जलं पिबति = तालाब से पानी पी रहा/रही है।
सरस्यां स्नाति = तालाब में नहा रहा/रही है।
ह्रदे स्थित्वा हृष्यति = तालाब में खड़ा होकर प्रसन्न हो रहा है।
कटाहे वटकान् तलति = कड़ाही में वड़े तल रहा/रही है।
घृतोदङ्के घृतं निस्सारयति =(घृत के कनस्तर में से) घृतपात्र में घी निकाल रहा/रही है।
भारते निवसति = भारत में रहता/रहती है।
शाखायां खगाः उपविष्टाः सन्ति = डाल पर पक्षी बैठे हैं।
अटव्याम् अटति = जंगल में घूम रहा/रही है।
कुशूले धान्यं पूरयति = कोठी में धान भर रहा/रही है।
गोण्यां गोधूमाः सन्ति = (बड़ी) बोरी में गेहूं है।
गोणीतर्यां गुडं वर्तते = छोटी बोरी में गुड़ है।
शिरसि तैलं नियोजयति = सिर में तेल लगा रहा/रही है।
शरीरेऽभ्यङ्गं करोति = शरीर पर मालीश कर रहा/रही
कर्गले काव्यं लिखति = कागज़ पर कविता लिख रहा/रही है।
शाके पलाण्डुं मा पातय = सब्जी में प्याज मत डाल।
भस्मनि हुतं तव कार्यमिदम् = राख में आहूति देने के समान तेरा यह कार्य व्यर्थ है।
एक एव खगो मानी वने वसति चातकः।
पिपासितो वा म्रियते याचते वा पुरन्दरम्।। = वन में केवल एक ही स्वाभिमानी पक्षी चातक निवास करता है। वह या तो प्यासा मर जाता है या तो इन्द्र से (जल की) याचना करता है।
माता यस्य गृहे नास्ति भार्या चाप्रियवादिनी।
अरण्यं तेन गन्तव्यं यथारण्यं तथा गृहम्।। = जिसके घर में माता न हो और पत्नी कडुए बोल बालने की आदी हो, उसे तो वन में चले जाना चाहिए; क्योंकि उसके लिए घर और जंगल एकसमान है।
दुष्टा भार्या शठं मित्रं भृत्यश्चोत्तरदायकः।
ससर्पे च गृहे वासो मृत्युरेव न संशयः।। = कटुभाषिणी और दुराचारिणी पत्नी, धूर्त स्वभाववाला मित्र, सामने बोलनेवाला नोकर ओर सांपवाले घर में रहना ये सब बातें मौत के समान ही हैं।
यस्मिन्देशे न सम्मानो न वृत्तिर्न च बान्धवाः।
न च विद्यागमः कश्चित् तं देशं परिवर्जयेत्।। = जिस देश में न तो आदर सम्मान है, न आजीविका प्राप्ति के साधन हैं, न बन्धु-बान्धव हैं और नहिकिसी प्रकार की विद्याप्राप्ति की सम्भावना है ऐसे देश को छोड़ देना चाहिए।
धनिकः श्रोत्रियो राजा नदी वैद्यस्तु पञ्चमः।
पञ्च यत्र न विद्यन्ते न तत्र दिवसं वसेत्।। = जहां धनवान्, वेदज्ञ ब्राह्मण, राजा, नदी और वैद्य ये पांच न रहते हों ऐसे स्थान पर तो एक दिन भी नहीं रहना चाहिए।
यः प्रीणयेत्सुचरितैः पितरं स पुत्रो, यद्भर्तुरेव हितमिच्छति तत्कलत्रम्।
तन्मित्रमापदि सुखे च समक्रियं, यदेतत्त्रयं जगति पुण्यकृतो लभन्ते।। = जो अपने उत्तम आचरण से पिता को प्रसन्न करे, वस्तुतः वही पुत्र है। जो सदा पति का कल्याण चाहे वही पत्नी है। जो सुख और दुःख में मित्र के साथ समान व्यवहार रखे वही मित्र है। संसार में ये तीनों बातें पुण्यकर्मा मनुष्यों को ही प्राप्त होती हैं।
यौवनं धनसम्पत्तिः प्रभुत्वमविवेकता।
एकैकमप्यनर्थाय किमु यत्र चतुष्टयम्।। = जवानी, धनसम्पत्ति प्रभुता (सत्ता) और अविवेक इनमें से एकेक भी अनर्थ का कारण हैं, फिर जहां ये चारों मिल जाएं वहां का तो कहना ही क्या..?
शैले शैले न माणिक्यं मौक्तिकं न गजे गजे।
साधवो न हि सर्वत्र चन्दनं न वने वने।। = सभी पर्वतों पर माणिक्य नहीं होते, सभी हाथियों के मस्तक में मोती नहीं उत्पन्न होता, सज्जन पुरुष सर्वत्र नहीं मिलते और प्रत्येक वन में चन्दन नहीं होता।
दुर्जनस्य मुखे प्रीतिर्वाणी चन्दनशीतला।
हृदये तस्य दुर्बुद्धेः कुलिशादपि कर्कशम्।। = दुर्जन अपने मुख पर प्रसन्नता लिए रहता है, उसकी वाणी चन्दन के समान शीतल प्रतीत होती है, किन्तु उस दुष्टबुद्धि के हृदय में वज्र से भी अधिक कठोरता होती है।
ओङ्कारशब्दो विप्राणां यस्य राष्ट्रे प्रवर्तते।
स राजा हि भवेद्योगी व्याधिभिश्च न पीड्यते।। = जिस राजा के राष्ट्र में ब्राह्मणों के द्वारा उच्चारित ओंकार का नाद गूंजता है, वही राजा योगी होता है और व्याधियों से पीड़ित नहीं होता।
मूर्खा यत्र न पूज्यन्ते धान्यं यत्र सुचितम्।
दम्पत्योः कलहो नाऽस्ति यत्र श्रीः स्वयमागताः।। = जहां मूर्खों की पूजा नहीं होती जहां अन्न-धान्य विपुल मात्रा में संचित रहते हैं, जहां पति-पत्नी में लड़ाई झगड़ा नहीं होता, वहां श्री याने लक्ष्मी स्वयं आकर निवास करने लगती है।
अपूज्या यत्र पूज्यन्ते पूजनीयो न पूज्यते।
त्रीणी तत्र प्रवर्तन्ते दुर्भिक्षं मरणं भयम्।। = जहां अपूज्यों की पूजा होती है और पूजनीयों का तिरस्कार होता है वहां तीन बातें होती हैं, दुर्भिक्ष याने अकाल, मौत और डर।
पुत्रसूः पाककुशला पवित्रा च पतिव्रता।
पद्माक्षी पञ्चपैर्नारी भुवि संयाति गौरवम्।। = वीर पुत्रों को जन्म देनेवाली, पाकविद्या में कुशल, पवित्र, पतिव्रता और पद्माक्षी याने सुन्दरी इन पांच पकारों से युक्त नारी संसार में गौरव प्राप्त करती है।
येषां न विद्या न तपो न दानं ज्ञानं शीलं न गुणो न धर्मः।
ते मर्त्यलोके भुविभारभूताः मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति।। = जिन मनुष्यों में न तो विद्या है, न तप है, न दान देने की भावना है, न ज्ञान है, न शील-स्वभाव है, न कोई उत्तम गुण है, न हि जीवन में धर्म का आचरण है; ऐसे व्यक्ति धरती पर बोझस्वरूप हैं, मानो मनुष्य जैसे दिखते हैं किन्तु निरे पशु ही हैं।
अयं च सुरतज्वालः कामाग्निः प्रणयेन्धनः।
नराणां यत्र हूयन्ते यौवनानि धनानि च।। = प्रेम जिसका ईंधन है और रतिक्रिया जिसकी ज्वाला है, ऐसी यह कामरूपी अग्नि में मनुष्य अपने यौवन और धन को फूंक देता है।
यावत्पवनो निवसति देहे तावत्पृच्छति कुशलं गेहे।
गतवति वायौ देहापाये, भार्या बिभ्यति तस्मिन्काये।। = जब तक शरीर में प्राण है, तब तक घर में व्यक्ति के कुशल-मंगल को लोग पूछते हैं। प्राण के निकल जाने पर और देह के गिर जाने पर पत्नी भी उस मृत शरीर को देखकर डरती है।
मूढ जहीहि धनागमतृष्णां कुरु सद्बुद्धिं मनसि वितृष्णाम्।
यल्लभसे निजकर्मोपात्तं वित्तं तेन विनोदय चित्तम्।। = हे मूर्ख ! धनप्राप्ति की लालसा को छोड़ दे, और मन में सद्बुद्धि तथा वितृष्णा को धारण कर। स्व कर्म से जितना धन प्राप्त करता है, उतने से ही चित्त को प्रसन्न कर।
धनानि भूमौ पशवश्च गोष्ठे भार्या गृहद्वारि जनः स्मशाने।
देहश्चितायां परलोकमार्गे कर्मानुगो गच्छति जीव एकः।। = जीवनभर संग्रह किया धन भूमिपर, पालतू पशु बाड़े में रह जाते हैं। पत्नी अधिक से अधिक द्वार तक और इष्ट-मित्र बन्धु-बान्धव श्मशान तक पहुंच जाते हैं, शरीर चिता तक साथ देता है। परलोक गमन में मनुष्य के साथ केवल उसके शुभाशुभ कर्म ही साथ जाते हैं।
नामुत्र हि सहायार्थं पिता-माता च तिष्ठतः।
न पुत्रदारा न ज्ञातिर्धर्मस्तिष्ठति केवलः।। = परलोक में माता-पिता, पुत्र-पत्नी और बन्धु-बान्धव कोई भी सहायता के लिए नहीं रहते हैं। वहां तो केवल धर्म ही सहायक होता है।
मृतं शरीरमुत्सृज्य काष्ठलोष्ठसमं क्षितौ।
विमुखा बान्धवा यान्ति धर्मस्तमनुगच्छति।। = बन्धु-बान्धव, निर्जीव शरीर को लकड़ी और मिट्टी के ढेले के समानभूमि पर छोड़कर मुंह मोड़कर चले जाते हैं। एक धर्म ही उसके साथ जाता है।
चला लक्ष्मीश्चलाः प्राणाश्चलं जीवित यौवनम्।
चलाचले च संसारे धर्म एको हि निश्चलः।। = इस चराचर जगत में लक्ष्मी (धन-सम्पत्ति) प्राण, यौवन  और जीवन सभी कुछ नाशवान् है। केवल एक धर्म ही निश्चल है।
अस्मिन्महामोहमये कटाहे सूर्याग्निना रात्रिदिवेन्धनेन।
मासर्तुदर्वी परिघट्टनेन भूतानि कालः पचतीति वार्ता।। = इस महामोहरूपी कड़ाह (संसार) में काल समस्त प्राणियों को मास और ऋतुरूपी कडछी से उलट-पुलट कर सूर्यरूपी अग्नि और दिन-रात रूपी इन्धन के द्वारा पका रहा है.. यही वार्ता (खबर) है।
स्वयं कर्म करोत्यात्मा स्वयं तत्फलमश्नुते।
स्वयं भ्रमति संसारे स्वयं तस्माद् विमुच्यते।। = जीव स्वयं ही कर्म करता है, स्वयं ही उन कर्मों का फल सुख-दुःख रूप में भोगता है, स्वयं ही संसार में विभिन्न योनियों में जन्म लेता है और स्वयं ही पुरुषार्थ करके संसार बन्धन से छूटकर मुक्त हो जाता है।
जन्ममृत्यू हि यात्येको भुनक्त्येकः शुभाशुभम्।
नरकेषु पतत्येक एको याति परां गतिम्।। = मनुष्य अकेला ही जन्म-मृत्यु के चक्र में फंसता है, अकेला ही पाप-पुण्य के फलों को भोगता है, अकेला ही नरक अर्थात् विविध दुःखदायी योनियों को प्राप्त करता है तथा अकेला ही मोक्ष को प्राप्त करता है।
यत्पृथिव्यां व्रीहियवं हिरण्यं पशवः स्त्रियः।
नालमेकस्य तत्सर्वमिति पश्यन्न मुह्यति।। = पृथ्वी पर जितना धान, जौ, सोना, पशु और स्त्रियां हैं, वे सब एक मनुष्य की समस्त कामनाओं को पूर्ण करके तृप्त करने के लिए भी पर्याप्त नहीं है; इस प्रकार विचार करनेवाला मनुष्य मोह में नहीं फंसता।
स्वर्गस्थितानामिह जीवलोके चत्वारि चिह्नानि वसन्ति देहे।
दानप्रसङ्गो मधुरा च वाणी देवाऽर्चनं ब्राह्मणतर्पणं च।। = इस संसार में स्वर्गवासियों के शरीर में चार चिह्न होते हैं.. 1. दान देने का स्वभाव, 2. मधुर वाणी, 3. देवों का सत्कार करना तथा 4. ब्राह्मणों को तृप्त करना।
अत्यन्त कोपः कटुका च वाणी दरिद्रता च स्वजनेषु वैरम्।
नीचप्रसङ्गः कुलहीनसेवा चिह्नानि देहे नरकस्थितानाम्।। = नरक में रहनेवालों के शरीर में निम्न चिह्न होते हैं.. 1. अत्यन्त क्रोधी स्वभाव, 2. कटु वाणी, 3. दरिद्रता, 4. अपनों से वैर, 5. नीचों की सङ्गति और 6. कुलहीनों की सेवा।
पत्रं नैव यदा करीरविटपे दोषो वसन्तस्य किम् ?
नोलूकोऽप्यवलोकते यदि दिवा सूर्यस्य किं दूषणम्।
वर्षा नैव पतन्ति चातकमुखे मेघस्य किं दूषणम्,
यत्पूर्वं विधिना ललाटलिखितं तन्मार्जितुं कः क्षमः।। = यदि करीर के पेड़ में पत्ते नहीं लगते तो इसमें वसन्त ऋतु का क्या दोष ? यदि उल्लू को दिन में नहीं दिखाई देता तो इसमें सूर्य का क्या अपराध ? यदि वर्षा की बूंदें चातक के मुख में नहीं पड़तीं तो इसमें बादलों का क्या दोष ? विधाता ने जो कुछ भी ललाट में लिख दिया है उसे कौन मिटा सकता है ?
अनवस्थितकार्यस्य न जने न वने सुखम्।
जने दहति संसर्गो वने सङ्गविवर्जनम् ।। अव्यवस्थित कर्म करनेवाले को न तो जनसमाज में सुख मिलता है और न वन में जनसमाज में मनुष्यों का संसर्ग उसे जलाता है और वन में एकाकी रहने के कारण वह दुःखी रहता है।
उदयति यदि भानुः पश्चिमे दिग्विभागे, प्रचलति यदि मेरुः शीततां याति वह्नः।
विकसति यदि पद्मं पर्वताग्रे शिलायां, न भवति पुनरुक्तं भाषितं सज्जनानाम्।। = चाहे सूर्य पश्चिम दिशा में उग आए, चाहे मेरु पर्वत अपना स्थान छोड़कर चल दे, चाहे अग्नि अपने गरम स्वभाव को त्याग शीतल बने और चाहे पर्वत के किसी पत्थर पर कमल खिल जाए.. (कवि इन असम्भव बातों की कल्पना करते कहता है..) परन्तु सज्जन लोग एक बार जो प्रतिज्ञा कर लेते हैं, उसे छोड़ नहीं सकते अर्थात् उनकी वाणी बेकार नहीं जाती।
कर्मजा हि शरीरेषु रोगाः शरीरमानसाः।
शरा इव पतन्तीह विमुखा दृढधन्विभिः।। = अपने पूर्वजन्म के पापकर्मों के फलस्वरूप उत्पन्न होनेवाले शारीरिक और मानसिक रोग मनुष्य के शरीर पर ठीक वैसे ही आक्रमण किया करते हैं, जैसे सिद्धहस्त धनुर्धारी द्वारा छोड़े गए बाण ठीक लक्ष्य पर जा गिरते हैं।
जले तैलं खले गुह्यं पात्रे दानमनागपि।
प्राज्ञे शास्त्रं  स्वयं याति विस्तारं वस्तु शक्तितः।। = जल में तेल, दुष्ट पुरुष में गुप्त बात, सत्पात्र को दिया दान और बुद्धिमान को दिया गया शास्त्रज्ञान ये थोड़े होने पर भी वस्तु की शक्ति से स्वयं विस्तार को प्राप्त हो जाते हैं।
धर्माऽऽख्याने श्मशाने च रोगिणां या मतिर्भवेत्।
सा सर्वदैव तिष्ठेच्चेत् को न मुच्येत बन्धनात्।। = धर्मकथा सुनते समय, स्मशान में और रोगी होने पर मनुष्य की जैसी बुद्धि उत्पन्न होती है यदि वह सदा बनी रहे तो संसार बन्धन से कौन नहीं छूट जाए ?
दूरस्थोऽपि न दूरस्थो यो यस्य मनसि स्थितः।
यो यस्य हृदये नास्ति समीपस्थोऽपि दूरतः।। = जो जिसके हृदय में बसा हुआ है, वह स्थान की दृष्टि से दूर होने पर भी दूर नहीं है। और जिसे दिल में बसाया नहीं है, वह पास होने पर भी दूर है ऐसा समझना चाहिए।


इति

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