पाठ: (12)तृतीया विभक्ति (4) + गुण सन्धिः ||


(क्रिया की विशेषता बतानेवाले शब्द को क्रियाविशेषण कहते हैं क्रियाविशेषण में तृतीया विभक्ति होती है। कहीं अव्यय शब्दों का भी प्रयोग क्रियाविशेषण के रूप में होता है।)

ज्ञानी सुखेन जीवती = ज्ञानी सुख से जीता है।
महात्मानः स्वभावेन कोमलाः भवन्ति = महात्मा स्वभाव से कोमल होते हैं।
गोदुग्धं प्रकृत्या मधुरं भवति = गाय का दूध स्वभावतः मीठा होता है।
विना धर्मं धनं च जीवनयात्रा दुःखेन चलति = धर्म और धन के बिना जीवन यात्रा दुःख से चलती है।
सन्तोषं विना च दुःखतरेण चलति = और सन्तोष के बिना तो जीवनयात्रा अत्यन्त दुःख से चलती है।
वैरागी तु सुखसुखेन जीवति = विरक्त व्यक्ति बहुत सुख से जीता है।
व्यापारे हानिः जाता। अहो वराक ! कृच्छ्रेण दिनानि यापयति = व्यापार में नुकसान हुआ.. अरे बेचारा..! कठिनाई से दिन बिता रहा है।
द्वीपी वेगेन धावति = चीता वेग से दौड़ता है।
चपला क्षणेन पलायते = बिजुली पलभर में भाग जाती है।
अविरलवारिधारासंपातेन वृष्टिः अभवत् = मूसलाधार बारिश हुई।
संयमी संयमेन जीवति तापसश्च तपसा = संयमी संयम से जीता है और तपस्वी तपपूर्वक।
परसुखासहिष्णुः दुःखदुःखेन जीवति = ईर्ष्यालु अत्यन्त कष्ट से जीता है।
नीचैः गच्छत्युपरि च दशा चक्रनेमिक्रमेण = जीवन की दशा पहिए के गोले के समान ऊपर-नीचे होती है।
किन्तु धीराः धैर्येण तिष्ठन्ति = परन्तु धीर लोग धैर्यपूर्वक रहते हैं।
नाम्ना शीतला अहम् = नाम से ही मैं शीतल हूं (=मेरा नाम शीतल है)।
नाम्ना जलनिधिः अस्ति, बिन्दुमपि न पाययति = नाममात्र का सागर है, बून्दभर भी पानी नहीं पिलाता।
श्रान्तः घोरया निद्रया शेते = थका हुआ व्यक्ति गहरी नीन्द सो रहा है।
विपत्तौ प्रायेण छिद्राः बहुली भवन्ति = गरीबी में आटा गीला।
साधुवृत्तानां विपत्तयः प्रायेण अस्थायिन्यो भवन्ति = सदाचारियों के जीवन में आयी हुई विपत्तियां प्रायः करके अस्थायी होती हैं।
हृदा उक्तं त्वरया शृणोति भगवान् = दिल से कही बुई बात शीघ्र ही भगवान सुनता है।
कर्मफलदाता कर्मफलम् अचिरेण ददाति = कर्मफलदाता कर्मफल को बिना देर किए (= समय पर) देता है।
चिरेण शयनं चिरेण जागरणं न शिष्टाचारः = देर से सोना और देर से जगना शिष्टों का आचरण नहीं है।
यदृच्छया किमपि न भवति जगति, सर्वं सहेतुकं भवति = अपनेआप संसार में कुछ भी नहीं होता, सबकुछ कारणपूर्वक ही होता है।
यौवनपदवीमारूढः सः यानं यदृच्छया चालयति = जवानी के मद में चूर वह गाड़ी को बेछूट चलाता है।
यदृच्छया अहमपि तत्र अगमम् = संयोग की बात है, मैं भी वहां गया हुआ / गई हुई था / थी।
विपणीपथं गच्छन्तं मां यदृच्छया भवान् अमिलत् = बजार जाते हुए मुझे रास्ते में संयोग से आप मिले।
नियमपालनं स्वेच्छया क्रियते स्वेच्छाचारिभिः = मनमौजियों के द्वारा निममों का पालन स्वेच्छापूर्वक किया जाता है।
चंचलं प्रमाथि बलवद् दृढं मनः काठिन्येन निगृह्यते = चंचल, मथ देनेवाला, बलवान् हठी मन कठिनाई से पकड़ में आता है।
किन्तु विरक्तं मनः सारल्येन निरुध्यते = परन्तु विरक्त मन सरलता से रुक जाता है।
पर्वतलुण्ठितः अनायासेन पतत्येव = पर्वत से लुढ़का हुआ अनायास गिरता ही जाता है।
धान्येन सह यवसं अनायासेन उद्गच्छति = धान के साथ घास बिना किसी प्रयत्न के ही उग जाता है।
प्रकृतिः जगद्रूपेण परिणमते न तु ब्रह्म = प्रकृति जगतरूप में परिणत होती है, ब्रह्म नहीं।
शीनकेन पयो दधिभावेन परिणमते = जामन के कारण दूध दहि बन जाता है।
धर्म रहिताः मनुष्यरूपेण मृगसदृशाः एव = धर्म से रहित लोग मनुष्यरूप में जंगली पशु के समान ही हैं।
त्यक्तेन भुञ्जीथाः = त्यागपूर्वक भोग कर।
अल्पेन न तुष्यन्ति तृषाः = प्यासे थोड़े से तृप्त नहीं होते।
शान्त्या उपविश मा शब्दं कुरु = शान्ति से बैठ, शोर मत कर !
साधवः सारल्येन वर्तन्ते = साधू लोग सरलता से व्यवहार करते हैं।
वाल्मिकी लवकुशौ सावधानेन पर्यपाठयत् = वचाल्मिकी ने लवकुश को सावधानी से पढ़ाया।

(क्रियाविशेषण के रूप में अव्ययों का प्रयोग)

मन्दं चल, मा त्वर = धीरे चल, जल्दी मत कर।
मन्दं मन्दं गीतं गुनगुनायते गीता = गीता मन्द स्वर में गीत गुनगुनारही है।
मा तिष्ठ, शीघ्रं चल..! = मत रुक, जल्दी चल..!
चिरं भवति, शीघ्रं शीघ्रं कथं न चलसि ? = देर हो रही है, जल्दी-जल्दी क्यों नहीं चलता है ?
कालं मा यापय, त्वरितं उत्तर..! = समय मत बिगाड़, जल्दी जबाब दे..!
वैद्यलिपीं मा प्रयुङ्क्ष्व, सुष्ठु लिख..! = डॉक्टर की सी शैली में मत लिख, सुन्दर अक्षरों में (= सुलेख) लिख..!
द्रुतम् एहि, कोऽपि द्रक्ष्यति..! = जल्दी आ जा, कोई देख लेगा..!
पित्रे सविनयं प्रणिपातय माम्..! = पिता को विनयपूर्वक मेरा प्रणाम कहना..!
तत्र भवन्तं सादरं प्रणमामि..! = हे पूजनीय, मेरा आप को सादर प्रणाम है..!
दृढं बध्नातु रज्जुं, मा उद्घटेत् = रस्सी मजबूती से बांधना खुल न जाए..!
वचो मा भ्रामय, सरलं वद..! = बात मत घुमा, सीधे बोल..!
न अवगम्यते किं वदति इति, स्पष्टं वद..! = क्या कह रहा है पता नहीं चल रहा है, अतः साफ-साफ कहो..!
तूष्णीं तिष्ठ, कोऽपि श्रोष्यति..! = चुप बैठ, कोई सुन लेगा..!
निश्श्ब्दं भव, श्रान्तो भविष्यति..! = चुप रहो वरना थक जाओगे..!
आस्तामत्र तावत्, निरवं प्रतीयते स्थानम् = यहां बैठो, शान्त जगह लग रही है।
जोषम् आस्ताम्, शिरोर्त्तिः बाधते = चुपचाप बैठ, सिरदर्द हो रहा है।
जोषं कुरु, स्वतन्त्रोऽसि = इच्छानुसार कर, स्वतन्त्र है तू।
जोषं वद, शीघ्रता नास्ति = आराम से बोल, जल्दी नहीं है।
शनैः चल, कथं त्वरायसे ? = आराम से चल, क्यों जल्दी मचा रहा है ?
शनैः भाषस्व, कुड्यमपि शृणोति कदाचित् = धीमे आवाज में बोल, दीवारों के भी कान होते हैं।
शनैः शनैः धर्मं संचिनुयाद् = धीरे-धीरे धर्म का संचय करे।
मृषा जल्पति = व्यर्थ बकवास करता है।
मृषा मा व्याहर = झूठ मत बोल।
इद्धा ब्रूहि किम् इच्छसि ? = साफ बताओ क्या चाहते हो ?
शाखां नीचैः कृत्वा दृढबीजं त्रोटयति = डाली को झुकाकर अमरुद तोड़ रहा है।
अहो ! रिक्तगुरु पात्रम्, नीचैः स्थापय = खाली होने पर भी कितना वजनदार पात्र है यह, इसे नीचे रख दे..!
उच्चैः मा आक्रोश, शिशुः शेते = शोर मत मचा, बच्चा सो रहा है।
निश्चप्रचं विजेष्यन्ते शूरा बाह्यान्तरान् रिपुन् = निश्चय ही शूरवीर बाहर और भीतर के दुश्मनों को जीतेंगे।
छिन्नोऽपि वंशवृक्षः पुनः रोहति = काट देने पर भी बांस फिर उग आया।
वृथा यतते यत् मूर्खान् उपदिशति = मूर्खों को उपदेश करना निरर्थक प्रयत्न है।
मृषा भोजयति कुपुत्रम् = कपूत को खिलाना व्यर्थ है।
मृषा वदति वादी = वादी झूठ बोल रहा है।
मुधा मा वद, पतिष्यति..! = झूठ मत बोल, पतन होगा..!
ज्योक् जीव..! = दीर्घजीवी हो..!
ज्योक् पश्येम सूर्यमुच्चरन्तम् = हम सदा देखें हृदय में विद्यमान (उपस्थित) प्रेरक को।
मिथ्या मा कुरु पदम्, सम्यक् लिख = शब्द को गलत मत कर ठीक से लिख।
प्रायः समापन्नविपत्तिकाले धियोऽपि सुधीनां मलिनी भवन्ति = विपत्तिकाल आने पर प्रायः विद्वानों की बुद्धि भी मलिन (= अच्छे-बुरे, उचितानुचित का विवेक न कर पाना) हो जाया करती है।
भूयो भूयो नमाम्यहं देवम् = दाता को बारम्बार मेरा प्रणाम।
भूयश्च शरदः शतात् = सौ वर्षों से भी अधिक जीएं।
उपभोगेन कामः भूयोऽभिवर्धते = भोग से कामना (= इच्छाएं) और अधिक बढ़ती हैं।
शुकं धावति घोटकः = घोड़ा तेज दौड़ रहा है।
सुकं तु शोभते व्यायामी संयमी दमी = व्यायाम करनेवाला, इन्द्रियसंयम करनेवाला मनोनियन्त्रण करनेवाला मनुष्य अतिशय शोभा को प्राप्त होता है।
दाता वसु मुहुर्मुहुर्दाशुषे ददाति = दाता ईश्वर देनेवाले को बार बार धन देता है।
अभीक्ष्णं चिन्तयति राष्ट्रं जागरूकाः = जागरूक नागरिक राष्ट्र की लगातार चिन्ता करते हैं।
मनाग् ददाति कृपणः = कंजूस थोड़ा देता है।
बालः सामि खादति सामि क्षिपति = बच्चा आधा खाता है, आधा फेंकता है।
संस्कृतानुवादपाठिभ्यः भूरि भूरि धन्यवादाः = संस्कृतानुवाद पढ़नेवालों को बहुत बहुत धन्यवाद।

गुणसन्धिः

{आद्गुणः। अ, ए, ओ इन तीन वर्णों की गुण संज्ञा है। अर्थात् इन तीनों को ‘गुण’ कहते हैं। अ अथवा आ के बाद इ अथवा ई हो तो दोनों (अ/आ+इ/ई) के स्थान पर ‘ए’, उ/ऊ हो तो दानों के स्थान पर ‘ओ’, ऋ/ऋृ हो तो दोनों के स्थान पर ‘अर्’, तथा लृ हो तो दोनों के स्थान पर ‘अल्’ हो जाता है।}

अ / आ + इ / ई = ए; मह् आ + ई शः = मह् ए शः = महेशः।
अ / आ + उ / ऊ = ओ; पर् अ + उ पकारः = पर् ओ पकारः = परोपकारः।
अ / आ + ऋ / ऋृ = अर्; मह् आ + ऋ षिः = मह् अर् षिः = महर्षिः।
अ / आ + लृ = अल्; = तव् अ + लृ कारः = तव् अल् कारः = तवल्कारः।

का + इदानीम् = केदानीम्।
केदानीं वेला ? वेला अस्ति भोक्तुम् = अभी क्या समय हुआ है ? भोजन का समय हुआ है।

का ईशा = केशा।
केशा अस्ति केशानाम् = लम्बे बालोंवाली महिला कौैन है ?

काक + ईश्वरः = काकेश्वरः।
काकेश्वरः काकसभम् अकार्षीत् = कौओं के मुखिया ने कौओं की सभा बुलाई।

पश्य + इदानीम् = पश्येदानीम्।
पश्येदानीं संध्याकालः संजातः, ईश्वरम् उपास्स्व..! = देख अभी संध्याकाल हो गया है, ईश्वर की उपासना कर..!

चन्द्र + उज्ज्वलाः = चन्द्रोज्ज्वलाः।
केयूराणि न भूषयन्ति पुरुषं हारा न चन्द्रोज्ज्वलाः = मानव की शोभा न तो बाजूबन्द से है न हि चन्द्र के समान चमकते हार से होती है।

विद्या + उत्तमाः = विद्योत्तमा।
सा विद्योत्तमा या मूर्खकालिदासं कविकालिदासं करोति = जो मूर्ख कालिदास को कवि कालिदास बनाती है, वह स्त्री उत्तम विद्यावाली मानी जाती है।

क्षेत्र + ऊर्वरम् = क्षेत्रोर्वरम्।
क्षेत्रोर्वरं दृष्ट्वा बीजं वपेत् = उर्वर भूमि में बीज बोना चाहिए (= पात्र को दान देना चाहिए)।

ब्रह्म + ऋषिः = ब्रह्मर्षिः, राज + ऋषिः = राजर्षिः।
वशिष्ठः ब्रह्मर्षिः बभूव विश्वामित्रश्च राजर्षिः = वशिष्ठ ब्रह्मर्षि थे और विश्वामित्र राजर्षि।

महा + ऋषिः = महर्षिः।
विजयतां महर्षिदयानन्दः येन संसारः निबोधितः = महर्षि दयानन्द जी की जय हो जिसने संसार को जगाया।

तव + लृकार = तवल्कार, तवल्कार + उच्चारणम् = तवल्कारोच्चारणम्।
तवल्कारोच्चारणं सम्यक् नास्ति, सुष्ठु कुरु = तेरा लृकार का उच्चारण ठीक नहीं है, उसे ठीक करो।

आचार्या शीतल जी आर्ष गुरुकुल अलियाबाद
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