पाठ: (21) पञ्चमी विभक्ति


(जब ल्यप्/क्त्वा प्रत्ययान्त धातु/क्रिया का वाक्य में प्रयोग तो न हुआ हो, किन्तु उसका अर्थ प्रतीत हो रहा हो, तब उस ल्यप्/क्त्वा प्रत्ययान्त क्रिया के कर्म व अधिकरण कारक में पञ्चमी विभक्ति होती है।)
दमयन्ती प्रासादात् (प्रासादम् आरुह्य) नलस्यन्दनं ददर्श = दमयन्ती ने महल से (महल पर चढ़कर) नल के रथ को देखा।
कन्या गवाक्षात् (गवाक्षम् आरुह्य) वीथ्यां पश्यति = कन्या खिड़की से गली को देख रही है।
हनुमान् पर्वतात् (पर्वतम् आरुह्य) रामलक्ष्मणौ अपश्यत् = हनुमान ने पर्वत से रामलक्ष्मण को देखा।
बालः छदिषः (छदिः आरुह्य) पतङ्गम् उड्डाययति = बालक छत से पतंग उड़ा रहा है।
अध्यापकः आसन्दिकायाः (आसन्दिकायाम् उपविश्य) व्याकरणं पाठयति = अध्यापक कुर्सीपर बैठकर व्याकरण पढ़ा रहे हैं।
पितामही शय्यायाः (शय्यायाम् उपविश्य) नप्त्रीं भर्त्सयति = दादी बिस्तर से धेवती (बेटी की बेटी) को ड़ांट रही है।
वधूः श्वशुरात् (श्वशुरं दृष्ट्वा) लज्जते = बहु ससुर से लजाती है।
कपिः वृक्षात् (वृक्षम् आरुह्य) फलानि क्षिपति = बन्दर पेड़ से फल फेंक रहा है।
वक्ता मञ्चात् (मञ्चे उपविश्य) वदति = वक्ता मंच से बोल रहा है।
सैनिकः वायुयानात् (वायुयाने उपविश्य) स्फोटकगोलं मुञ्चति क्षिपति वा = सैनिक विमान से बम फेंक रहा है।
विद्वान् बुद्धि से संसार को देखता है = बुधः बुद्धेः (बुद्धिं प्रयुज्य) संसारं पश्यति।

(मार्ग और काल के माप के विषय में जहां से काल और मार्ग का माप करना हो उसमें पञ्चमी विभक्ति होती है।)

सिकंदराबादात् हैदराबादं दूरे नास्ति = सिकंदराबाद से हैदराबाद दूर नहीं है।
मम ग्रामात् नगरं त्रिंशत्-किलोमीटर-यावत् अस्ति = मेरे गांव से नगर तीस किलोमीटर जितना दूर है।
रामस्य गृहात् रमेशस्य गृहं दूरे वर्तते = राम के घर से रमेश का घर दूर है।
शरद्-पौर्णमास्याः कार्तिकी पौर्णमासी मासे वर्तते = शरद् पूर्णिमा से कार्तिक पूर्णिमा एक महिने के बाद होती है।
मङ्गलवासरात् शनिवासरः त्रिषु दिवसेषु अस्ति = मंगलवार से शनिवार तीन दिन बाद है।
माता दिल्लीतः दिनद्वयेऽत्र आगमिष्यति = मां दिल्ली से दो दिन में यहां आएगी।
सोमवासरात् बुधवासरपर्यन्तं कार्यक्रमोऽस्ति = सोमवार से बुधवार तक कार्यक्रम है।

{अन्य, भिन्न, इतर, आरात्, (निकट, दूर) इन शब्दों से युक्त शब्दों में तथा पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, प्राक्, प्रत्यक्, उदक्, दक्षिणा, उत्तरा, दक्षिणाहि और उत्तराहि शब्दों से युक्त शब्दों में पञ्चमी विभक्ति होती है।}

मत् शीतला अन्य स्वभावा = मुझसे शीतल का स्वभाव अलग है।
प्रिय ! रामात् अन्यो बलरामः = प्यारे ! राम सेे बलराम भिन्न है।
यज्ञात्कर्मणोन्यऽत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः।
तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर।। = यज्ञीय कर्म (निष्काम भावना से किए गए कर्म) से भिन्न कर्म संसार में बांधनेवाले हैं। अतः हे अर्जुन आसक्ति रहित होकर यज्ञीय (निष्काम) कर्म कर।
यथा फलानां पक्वानां नान्यत्र पतनाद् भयम्।
एवं नरस्य जातस्य नान्यत्र मरणाद् भयम्।। = जैसे पके हुए फलों को गिरने के अलावा और कोई भय नहीं होता, वैसे ही उत्पन्न हुए मनुष्य को मृत्यु के सिवा और कोई भय नहीं होता।
एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः।
त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते।। = हे कृष्ण ! मेरे इस संशय को तू पूर्णरूप से नष्ट कर सकता है। तेरे बिना अन्य कोई इस संशय को छिन्न-भिन्न करनेवाला नहीं मिल सकता।
कस्मै अपि दद्यात्, मत्तः मम अनुजो न भिन्नः = किसी को भी दे सकते हो ! मेरे से मेरा छोटा भाई अलग नहीं है (हम दोनों एक ही हैं)।
एषा सैव वार्ता न, तस्याः भिन्नाऽस्ति = यह वही बात नहीं है, उससे अलग है।
परशुरामः रामात् इतरः आसीत् = परशुराम राम से पृथक् (भिन्न) था।
त्वदितरः कः कल्पते कर्त्तुमिदम् ? = तेरे सिवा कौन इसे कर सकता था ?
भीरवः अस्मद् इतरे खलु स्युः, वयं तु राजपूताः = डरपोक तो हमसे कोई दूसरे होंगे, हम तो राजपूत हैं।
ग्रामस्य आरात् आरामोऽस्ति = गांव के समीप बगीचा है।
भारतवर्षं हिमालयात् दक्षिणे वर्त्तते = भारतवर्ष हिमालय से दक्षिण में है।
मध्यप्रदेशात् गुजरातप्रान्तः पश्चिमो वर्त्तते दिल्ली-नगरी च उत्तरा = गुजरात मध्यप्रदेश के पश्चिम में है और दिल्ली उत्तर में है।
गुरुकुलं ग्रामात् पूर्वेऽस्ति = गुरुकुल गांव की पूर्व दिशा में है।
रामात् पूर्वो यः स्थितः सः श्यामोऽस्ति = राम से पहले जो खड़ा है वह श्याम है।
अस्मात् तगाडात् प्राक् प्रत्यक् उदक् च पर्वताः सन्ति = इस तालाब के पूर्व, पश्चिम तथा उत्तर में पहाड़ हैं।
कृष्णात् प्राक् रामो जातः = कृष्ण से पहलेे राम हो गए।
नैव सृष्टिरचनाऽदिकालीना, सृष्टेः प्राक् प्रलयो भवति = अनादि काल से सृष्टि नहीं चली आ रही है, सृष्टि से पहले प्रलय होता है।
राजस्थानं गुजरातप्रान्ताद् उत्तरा अस्ति = राजस्थान गुजरात से उत्तर दिशा में है।
आन्ध्रप्रदेशात् रामेश्वरं दक्षिणा वर्तते = आन्ध्रप्रदेश के दक्षिण में रामेश्वर है।
गृहात् उत्तरा अतीव समीचीनं दृश्यते = घर का उत्तरवाला भाग बहुत सुन्दर दिख रहा है।
गुरुकुलात् दक्षिणा क्षेत्रं शुष्कं जातम् = गुरुकुल का दक्षिणभाग का खेत सूख गया।
आश्रमभवनात् दक्षिणाहि विद्यालयः उत्तराहि च भोजनालयः अस्ति = आश्रम भवन के दक्षिण में विद्यालय और उत्तर में भोजनालय है।
गुरुकुलस्य दक्षिणाहि उत्तराहि च रमणीयं वर्त्तते = गुरुकुल का दक्षिण व उत्तरभाग सुन्दर है।
संस्थानाद् दक्षिणाहि गच्छ = चौराहे से दक्षिण में जाना।

(प्रभृति, आरभ्य, बहिः, ऊर्ध्वम्, अनन्तरम् के योग में भी पञ्चमी विभक्ति होती है।)

इतः प्रभृति नगर पर्यन्तं वृष्टो देवः = यहां से लेकर शहर तक वर्षा हुई।
हिमालयात् प्रभृति रामेश्वर पर्यन्तं भारतवर्षं वर्तते = हिमालय से लेकर रामेश्वर तक भारतवर्ष है।
प्रतिपदायाः आरभ्य त्रयोदशीपर्यन्तं विद्यालयं चलति। चतुर्दश्यां पौर्णमास्यां च अवकाशो वर्तते = प्रतिपदा से लेकर त्रयोदशी तक विद्यालय चलता है। चतुर्दशी और पूर्णिमा को अवकाश होता है।
भारतात् बहिर्वेदविद्या दुर्लभा = भारत से बाहर वेदविद्या दुर्लभ है।
पृथ्वीलोकाद् ऊर्ध्वमन्तरिक्षलोको वर्तते, ततः ऊर्ध्वञ्च द्युलोकः = पृथ्वीलोक के ऊपर अन्तरिक्ष लोक है और उससे ऊपर द्युलोक।
अतः ऊर्ध्वं षष्ठी-विभक्तेः पाठो भविष्यति = इसके पश्चात् षष्ठी विभक्ति का पाठ होगा।
सोमवासराद् ऊर्ध्वं मङ्गलवासरो भवति = सोमवार के बाद मंगलवार होता है।
मङ्गलवासराद् अनन्तरं बुधवासरः = मंगलवार के बाद बुधवार होता है।
भोजनस्य सम्यक् पाकाय भोजनाद् अनन्तरं जलं न पातव्यं किन्तु देशि-गुडं भोक्तव्यम् = भोजन के सुपाचन हेतु तुरन्त बाद पानी नहीं पीना चाहिए, किन्तु देशी गुड़ (रसायन रहित) खाना चाहिए।
न तिष्ठति तु यः पूर्वां नोपास्ते यश्च पश्चिमाम्।
स शूद्रवत् बहिष्कार्यः सर्वस्माद् द्विजकर्मणः।। = जो मनुष्य प्रातः व सायं सन्ध्योपासना नहीं करता उसे शूद्र के समान समस्त द्विजकर्म (ब्राह्मण, क्षत्रिय व वैश्य के कर्म) से वंचित कर देना चाहिए।

{‘अप’ तथा ‘परि’ जब वर्जन (त्याग) अथवाले होते हैं, तब उसकी कर्मप्रवचनीय संज्ञा होती है, और उनसे युक्त शब्दों में पञ्चमी विभक्ति का प्रयोग होता है।}

अप अलियाबादात् दक्षिणाहि मेघो मेहति = अलियाबाद को छोड़कर दक्षिण दिशा में बादल बरस रहे हैं।

परि भारतात् परिवारो दुर्लभः = भारत को छोड़कर अन्य देशों में परिवार मिलना दुर्लभ है।
परि कृषेरन्ये व्यवसायाः औन्नत्याय न कल्पते = खेती को छोड़कर अन्य व्यवसाय उन्नति कराने में समर्थ नहीं हैं।

{आ (आङ्) जब मर्यादा (उसको छोड़कर) तथा अभिविधि (उसके सहित) अर्थ में होते हैं, तब उसकी कर्मप्रवचनीय संज्ञा होती है, तथा उससे युक्त शब्दों में पञ्चमी विभक्ति का प्रयोग होता है।}

(मर्यादा) आ ग्रामाद् दृढो मार्गो वर्तते = गांव को छोड़कर पक्की सड़क है।
आ क्षेत्रात् गुरुकुलं शुचिकृतम् = खेत को छोड़कर सारा गुरुकुल साफ किया।
(अभिविधि) आ कुमारेभ्यः यशः पाणिनेः = बच्चे-बच्चे तक पाणिनि की कीर्ति फैली हुई है।
आ बालात् आतङ्कं प्रासारयत् मुगलशासकाः = यवन शासकों ने अपने आतंक से बच्चे तक को नहीं छोड़ा था।
उत्तरा आ काश्मीरात् दक्षिणाहि आ रामेश्वरात् पश्चिमे आ गुजरातात् पूर्वस्याञ्च दिशि आ अरुणाचलप्रदेशात् भारतवर्षस्य सीमा अस्ति = उत्तर में कश्मीर तक, दक्षिण में रामेश्वर तक, पश्चिम में गुजरात तक तथा पूर्व में अरुणांचल प्रदेश तक भारत की सीमा है।

{प्रतिनिधि के विषय में और प्रतिदान (एक वस्तु के बदले में दूसरी देना) के विषय में प्रति शब्द की कर्मप्रवचनीय संज्ञा होती है, तथा उससे युक्त शब्द में पञ्चमी विभक्ति का प्रयोग होता है।}

आचार्यात् प्रति शिष्यः सभायाम् उपातिष्ठत् = आचार्य के प्रतिनिधि के रूप में शिष्य सभा में उपस्थित रहा।
पाण्डवेभ्यः प्रति कृष्णः शान्तिप्रस्तावं नीत्वा दुर्योधनम् उपातिष्ठत् = पाण्डवों की ओर से शान्ति प्रस्ताव लेकर कृष्ण दुर्योधन के पास गए।
रुग्णपितुः प्रति पुत्रः कार्यम् अकार्षीत् = बीमार पिता के बदले में पुत्र ने काम किया।
तिलेभ्यः प्रति माषान् यच्छति = तिल के बदले में उड़द देता है। (किसी से तिल लेकर बदले में उड़द देता है।)
गोदुग्धात् प्रति महिषीदुग्धं यच्छति = गोदुग्ध के बदले भैंस का दूध देता है। (किसी से गाय का दूध लेता है, बदले में भैस का दूध देता है।)
विद्यायाः प्रति धनं ददाति = विद्या के बदले में धन देता है।
आपणिकः रुप्यकेभ्यः प्रति वस्तूनि ग्राहकाय ददाति = दुकानदार पैसे के बदले में ग्रहक को वस्तुएं देता है।

आचार्या शीतल जी आर्ष गुरुकुल अलियाबाद
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