पाठ: (13)तृतीया विभक्ति 5


(जिस अंग के विकार से शरीर को विकृत माना जाए, उस अंग में तृतीया विभक्ति होती है।)
नेत्रेण अन्धोऽपि पथि सम्यक् व्यवहरति = आंख से अन्धा होने के बावजूद भी रस्ते पर ठीक चलता है।

अन्धापेक्षया नेत्रेण काणोऽपि ज्यायान् = अन्धे की अपेक्षा आंख से काणा व्यक्ति अच्छा है।

हस्तेन लुञ्जोऽपि परिश्रमेण जीवति = एक हाथ से विकलांग होने पर भी महनत कर के जीता है।

कराभ्यां विकलोऽपि प्रसन्नवदनः तिष्ठति = दोनों हाथों से विकलांग होने पर भी प्रसन्नवदन रहता है।

पादेन खञ्जोऽपि भृशं धावति = पैर से लंगड़ा होते हुए भी खूब दोड़ता है।

यत्र प्रजा मुखेन मूका भवति, राजा कर्णेन बधिरो भवति, तत्र नूनं विनाशो भवति = जहां प्रजा गूंगी होती है और राजा बहरा होता है वहां निश्चय ही विनाश होता है।

शिरसा खल्वाटोऽयं केशविन्यासान् पश्यति = टकलु हेअरस्टाईल देख रहा है।

मन्थरा पृष्ठेन कुब्जा आसीत् = मन्थरा पीठ से कुबड़ी थी।

शरीरेण वामनोऽपि शिवराजः दीर्घकायान् शत्रून् अवपातयति स्म = शरीर से बौना होने पर भी शिवाजी महाकाय शत्रुओं को पछाड़ देता था।

दन्तैः रिक्तोऽपि गोलगप्पां वाञ्छति = मुख में दांत नहीं फिर भी गोलगप्पे खाना चाहता है।

अहो आश्चर्यम् अङ्गुलिभिः विकलोऽपि कुष्ठी वस्त्रं वयति = अहो आश्चर्य है, बिना ऊंगलियों के भी कोढ़ी कपड़ा बुन रहा है।

ग्रीवया वक्रोऽपि लक्ष्यं अमोघं विध्यति = टेढ़ी गर्दनवाला भी निशाना अचूक लगाता है।

अक्ष्णा केकरः न ज्ञायते कुत्र पश्यति = भेंगा (squint) व्यक्ति कहां देखता है पता नहीं चलता।

(किम्, किं कार्यम्, कोऽर्थः, किं प्रयोजनम् इन शब्दों के साथ तृतीया विभक्ति का प्रयोग होता है।)

सन्दीप्ते भवने कूपखनेन किं, किं कार्यम्, किं प्रयोजनम् कोऽर्थः वा ? = घर जल जाने के बाद कुंआ खोदने से क्या लाभ ?
काले दत्तं वरं ह्यल्पम् अकाले बहुनाऽपि किम् ? = समय पर थोड़ा दिया जाना भी बहुत कहाता है जबकि समय निकल जाने पर बहुत सारा दिया जाना भी व्यर्थ है।
धर्महीनेन मनुष्येण कोऽर्थः = धर्मरहित व्यक्ति से क्या लाभ ?
लवणं विना स्वादु भोजनेन किं = नमक के बिना स्वादिष्ट भोजन कैसा ?
ज्ञानेन विना बलेन किं कार्यम् = ज्ञान के बिना बल किस काम का ?
दृष्टिं विना अक्ष्णा किं प्रयोजनम् = दृष्टि के बिना आंख से क्या लाभ ?
किं तेन जातेन येन वंशो न गच्छति समुन्नतिम् = उसके जन्म लेने से क्या लाभ जिसके कारण वंश उन्नत न हो ?
किं तेन पठनेन येन सदाचारो न शिक्षितः ? = उस पढ़ाई से क्या लाभ जो सदाचार नहीं सिखाता ?
किं तेन धनेन येन दानेन हस्तो न भूषितः ? = उस धन से क्या लाभ जिसने दान से हाथ की शोभा नहीं बढ़ाई ?
किं तेन बुधेन यो सत्यं न भाषते = वह कैसा विद्वान् है जो सत्य नहीं बोलता ?

(अलम् तथा कृतम् इन दो शब्दों के साथ भी तृतीया विभक्ति होती है यदि बस या मत अर्थ हो तो।)

अलम् अतिविस्तरेण, समासेन ब्रूहि..! = ज्यादा विस्तार मत करो, संक्षेप में कहो..!
अलं मोहेन, वानप्रस्थी भव..! = मोह मत कर, वानप्रस्थ धारण कर..!
अलं वार्तालापेन, मौनं धारय..! = बातें मत कर चुप रह..!
अलं क्रीडनेन, पाठं स्मर..! = बस कर खेल, पाठ याद कर..!
कृतम् अत्यादरेण न त्वा काङ्क्षे = बहुत आदर कर दिया अब मुझे तेरी जरूरत नहीं है।
कृतं कार्येण अन्यत् कर्मकरी करिष्यति = बहुत काम कर दिया, अब रहने दो, कामवाली कर देगी।
कृतं सहाय्येन, त्यज, स्वयं करिष्यामि = बहुत सहयोग कर दिया, छोड,़ अब मैं स्वयं कर लूंगा।

(कार्य की सफलता बताई जाए तो समय व मार्ग की दूरीवाचक शब्दों में तृतीया होती है।)

मासेन ग्रन्थः अधीतः = महिनेभर में ग्रन्थ पढ़ लिया।
सा दशभिः दिनैः निरोगी अभूत् = वह दस दिनों में स्वस्थ हो गई।
पञ्चभिः वर्षैः व्याकरणम् अधीयते = ठीक से व्याकरण पढ़ने के लिए पांच वर्ष लगते हैं।
सप्तभिः दिनैः शिबिरं समापयत् = उसने सात दिन में शिबिर का सफलतापूर्वक समापन किया।
घण्टाद्वयेन भोजनम् अपाक्षीत् = उसने दो घण्टे में भोजन पका दिया।
षण्मासेन अष्टाध्यायीम् अस्मरत् = छः महिने में अष्टाध्यायी कण्ठस्थ कर ली।
पञ्चमीलेन कथाम् अश्रावयत् = पांच मील तक उसने कथा अच्छी तरह सुना दी।
किलोमिटरेण तिमिरम् अपगतम् = किलोमीटरभर में तो अंधेरा दूर हो गया।
क्रोशेण हास्यकणिकाम् अवदत् = कोसभर चुटकुले बोलता रहा।
शतयोजनेन हंसः हिमवन्तं प्रापत् = सैकड़ों योजन चलकर हंस हिमालय पहुंचा।

(‘शप्’ धातु के साथ शपथ की वस्तु में तृतीया विभक्ति होती है।)

न्यायालये गीता पुस्तकेन शापयति = न्यायालय में गीता की शपथ दिलाते हैं।
भगवता शपे..! नैतत् मया कदापि कृतम् = भगवान् की सौगन्ध मैंने इसको कदापि नहीं किया।
सत्यवादिनं सत्येन शापयेत् = सत्यवादी को सत्य की शपथ दिलानी चाहिए।
आत्मना शपे यदि मृषा वदेयम् = मुझे अपनी ही कसम, यदि मैं झूठ बोलूं।
त्वया शपामि, सत्यं वदामि = तेरी कसम, मैं सच बोल रहा / रही हूं।

(सं + वद् तथा अनु + हृ के साथ तृतीया विभक्ति का प्रयोग होता है।)

अस्याः मुखं मातुः मुखेन संवदति = चेहरे से अपनी मांपर गया है।
मुखेन मातरम् अनुहरति = मां के जैसा ही इसका भी चेहरा है।
प्रद्युम्नः दर्शनेन कृष्णम् अनुहरति स्म = प्रद्युम्न दिखने में हूबहू कृष्ण जैसा था।
प्रायः बालिका पितरम् अनुहरति मुखेन = प्रायः कन्याओं का चेहरा अपने पिता से मेल खाता है।
शरीरेण भीमं संवदति = शरीर से भीम जैसा है।

(अशिष्ट व्यवहार = शास्त्र निषिद्ध कर्म में जिसको कुछ दिया जाए उसमें तृतीया विभक्ति होती है।)

सः समस्तं धनं वाराङ्नाभिः अदात् = उसने सारा धन वेश्याओं को दे दिया।
गणिका ऋषिवधाय सूपकारेण द्रविणम् अददात् = ऋषि को जान से मारने के लिए वेश्या ने रसोइए को धन दिया।
शत्रुदेशः आतङ्कवादिभिः धनं ददाति = शत्रुदेश आतङ्कवादियों को धनदेता है।
स्वैरि स्वैरिण्या धनं दास्यति = व्यभिचारी व्यभिचारिणी को धन देगा।
अनार्यैः धनं मा दद्यात् = अनार्यों को धन मत दो।
सर्वकारः गोवधकैः अनुदानं मा दद्यात् = सरकार को गोवध करनेवालों को अनुदान नहीं देना चाहिए।

वृद्धि सन्धिः

(वृद्धिरेचि। आ, ऐ, औ इन तीन वर्णों की वृद्धि संज्ञा है। अ/आ के बाद ए/ऐ हो तो दोनों के स्थान पर ‘ऐ’ तथा अ/आ के बाद ओ/औ हो तो दोनों के स्थान पर ‘औ’ हो जाता है।)

अ/आ + ए/ऐ = ऐ; तद् आ + ए कः = तद् ऐ कः = तदैकः
अ/आ + ओ/औ = औ; मह् आ + औ षधिः = मह् औ षधिः = महौषधिः

तस्य + ऐश्वर्यम् = तस्यैश्वर्यम्।
तस्यैश्वर्यं दृष्ट्वा दुर्योधनः ईर्ष्यति = उसका ऐश्वर्य देखकर दुर्योधन को ईर्ष्या हो रही है।

वित्त + एषणा = वित्तैषणा, पुत्र + एषणा = पुत्रैषणा, लोक + एषणा = लोकैषणा।
सामान्यतः मनुष्येषु एषणात्रयं वर्तते, वित्तैषणा पुत्रैषणा लोकैषणा च = सामान्यरूप से मानवों में तीन एषणाएं होती हैं, वित्तैषणा, पुत्रैषणा तथा लोकैषणा।

विद्या + ऐषणा = विद्यैषणा
विद्वत्सु विद्यैषणा दरीदृष्यते = विद्वानों में प्रायः विद्या प्राप्ति की इच्छा देखी जाती है।

महा + औषधम् = महौषधम्।
मौनमेव महौषधं मूर्खाणाम् = मूर्खों का अन्तिम इलाज (स्वयं) मौन हो जाना है।

तथा + एव = तथैव।
यथा वदन्ति तथैव कुर्वन्ति सज्जनाः = सज्जन लोग जैसा कहते हैं वैसा ही करते हैं।

दिव्य + ओषधैः = दिव्यौषधैः।
यदि सुहृद् दिव्यौषधैः किं फलम् ? = यदि मनुष्य के पास सच्चा मित्र है, तो उसे दिव्य औषधियों से क्या प्रयोजन ?

सर्वस्य + औषधम् = सर्वस्यौषधम्।
सर्वस्यौषधमस्ति शास्त्रविहितं मूर्खस्यनास्त्यौषधम् = शास्त्रों में सभी रोगों की दवा है किन्तु मूर्खों की कोई दवा नहीं है।

तृष्णा + ओघः तृष्णौघः।
विट्षु विष्टः तृष्णौघः तापयति नाग्निः = अग्नि नहीं तपाता किन्तु मनुष्यों में विद्यमान तृष्णाओं का महान् समूह तपाता है।


आचार्या शीतल जी आर्ष गुरुकुल अलियाबाद
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