व्यवहृपणोः समर्थयोः - षष्‍ठी विभक्तिः ।।



सूत्रम् – व्यवहृपणोः समर्थयोः ।। २ ⁄ ३ ⁄  ५७ ।।
समानार्थी व्यवहृ‚ पण् च धात्वोः कर्मणि सम्बन्धमात्रस्य विवक्षायां षष्ठी विभक्तिः भवति ।

उदाहरणम् –

शतस्य व्यवहरणं पणनं वा – सौ रूपये का लेन–देन अथवा सौ रूपये का जुआ खेलना ।

हिन्दी – समान अर्थ वाली व्यवहृ तथा पण् धातुओं के कर्म में सम्बन्ध मात्र की विवक्षा होने पर षष्ठी विभक्ति होती है । क्रय विक्रय तथा जुआ खेलना दोनो धातुएं समान अर्थ वाली हैं ।

इति

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