अधिरीश्‍वरे ... सप्‍तमी विभक्ति: ।।


सूत्रम् - अधिरीश्‍वरे ।। 1/4/97 ।। 
(अध्‍ािकरण कारकम्) 

स्‍व (वस्‍तु), स्‍वामी (अधिकारी, मालिक) च अर्थप्रकटने 'अधि' इत्‍यस्‍य कर्मप्रवचनीया संज्ञा भवति ।

हिन्‍दी - 
स्‍व और स्‍वामी के अ‍र्थ को प्रकट करने में 'अधि' की कर्मप्रवचनीय संज्ञा होती है ।

सूत्रम् - यस्‍मादधिकं यस्‍य चेश्‍वरवचनं तत्र सप्‍तमी ।। 2/3/9 ।। 

'यस्‍मात् अधिकं अस्ति', 'यस्‍य स्‍वामित्‍वं उच्‍यते' एतयो: अर्थयो: कर्मप्रवचनीय योगे सप्‍तमी विभक्ति: भवति ।

उदाहरणम् - 
उप परार्धे ह‍रेर्गुणा: - हरि के गुण परार्ध से भी अधिक हैं । 
अधि भुवि राम: - राम पृथ्‍वी के स्‍वामी हैं । 
अधि रामे भू: - पृथ्‍वी राम के स्‍वामित्‍व में है । 

हिन्‍दी - 
'जिससे अधिक है' तथा 'जिसका स्‍वामित्‍व कहा जाता है' इन दोनों अर्थों में कर्मप्रवचनीय के योग में सप्‍तमी होती है ।

परार्ध - परार्ध सबसे बडी संख्‍या है । इससे बढकर कोई संख्‍या नहीं होती ।


इति

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