लोपसंज्ञा

अदर्शनं लोपः ।।०१⁄०१⁄६०।।
प्रसक्तस्यादर्शनं लोपसंज्ञं स्यात् ।

प्राप्त वर्ण का न सुना जाना लोपसंज्ञा वाला हो । अर्थात् शास्त्र द्वारा जिसका सुना जाना प्राप्त है उसका श्रवण न होना लोप कहलाता है ।

अवधेय – संस्कृत व्याकरण में वर्ण नित्य हैं‚ इनका नाश नहीं होता । किन्तु प्राप्त वर्ण का न सुना जाना ही उसका लोप कहा जाता है । वह वर्ण अपने नियत स्थान पर उपस्थित होते हुए भी मुखर नहीं होता है‚ इसे ही लोप कहा जाता है ।

तस्य लोपः ।।०१⁄०३⁄०९।। 
तस्येतो लोपः स्यात् । णादयोSणाद्‍यर्थाः ।


हलन्त्यम् आदि सूत्रों से जिसकी संज्ञा हो जाती है उस इत्संज्ञक वर्ण का लोप हो । इसी सूत्र के कारण माहेश्वर सूत्रों में अन्तिम हल् वर्ण का ग्रहण प्रत्याहार के वर्णों के अन्तर्गत नहीं किया जाता है‚ अपितु उनका लोप हो जाता है ।

इति

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