गरुडगमन तव चरणकमलमिह
मनसि लसतु मम नित्यम्
मनसि लसतु मम नित्यम् ॥
मम तापमपाकुरु देव
मम पापमपाकुरु देव ॥

जलजनयन विधिनमुचिहरणमुख
विबुधविनुत-पदपद्म -2
मम तापमपाकुरु देव
मम पापमपाकुरु देव ॥


भुजगशयन भव मदनजनक मम
जननमरण-भयहारी -2
मम तापमपाकुरु देव
मम पापमपाकुरु देव ॥

शङ्खचक्रधर दुष्टदैत्यहर
सर्वलोक-शरण -2
मम तापमपाकुरु देव
मम पापमपाकुरु देव ॥

अगणित-गुणगण अशरणशरणद
विदलित-सुररिपुजाल -2
मम तापमपाकुरु देव
मम पापमपाकुरु देव ॥

भक्तवर्यमिह भूरिकरुणया
पाहि भारतीतीर्थम् - 2
मम तापमपाकुरु देव
मम पापमपाकुरु देव ॥

इति

1 टिप्पणियाँ

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